पैंतीस वर्ष से कम आयु के रोगियों में पाए जाते हैं 60 प्रतिशत मानसिक विकार : भारतीय मनोरोग सोसायटी
पैंतीस वर्ष से कम आयु के रोगियों में पाए जाते हैं 60 प्रतिशत मानसिक विकार : भारतीय मनोरोग सोसायटी
नयी दिल्ली, 28 जनवरी (भाषा) विशेषज्ञों का मानना है कि लगभग 60 प्रतिशत मानसिक विकार 35 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों में पाए जाते हैं। भारतीय मनोरोग सोसायटी के 77वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन (एएनसीआईपीएस-2026) में भारत के मानसिक स्वास्थ्य परिदृश्य की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है।
उच्च स्तरीय वैज्ञानिक विचार-विमर्श के दौरान साझा किए गए आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि भारत में मानसिक बीमारी अब वृद्धावस्था के चरणों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि किशोरों, युवाओं और करियर के अपने सबसे उत्पादक वर्षों में भी लोगों को मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
भारतीय मनोरोग सोसायटी का यह चार दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन 28 से 31 जनवरी तक दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित किया जा रहा है, और इसमें देश भर से हजारों मनोचिकित्सक, चिकित्सक, शोधकर्ता और नीति निर्माता एक साथ आए हैं।
एएनसीआईपीएस-2026 में विशेषज्ञों ने इस बात पर प्रकाश डाला कि मानसिक विकार की समस्या कम उम्र में अक्सर किशोरावस्था या युवावस्था के दौरान सामने आती है, और इनके शुरू होने की औसत आयु 19 से 20 वर्ष के बीच होती है।
इस सम्मेलन में प्रस्तुत वैश्विक और भारतीय अध्ययन एक गंभीर तस्वीर पेश करते हैं।
‘मॉलिक्यूलर साइकियाट्री’ नामक पत्रिका में प्रकाशित बड़े पैमाने के एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सात लाख से अधिक व्यक्तियों पर नजर रखी गई। अध्ययन से पता चला है कि मानसिक विकार की 34.6 प्रतिशत समस्या 14 वर्ष की आयु से पहले, 48.4 प्रतिशत 18 वर्ष की आयु से पहले और 62.5 प्रतिशत 25 वर्ष की आयु तक शुरू हो जाती है।
इन निष्कर्षों से पता चलता है कि अधिकांश रोगियों के लिए मानसिक बीमारी वयस्कता से काफी पहले शुरू हो जाती है, जो चुपचाप शैक्षिक परिणामों, करियर पथों, रिश्तों और जीवन की समग्र गुणवत्ता को प्रभावित करती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि 25 वर्ष की आयु तक, ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार (एडीएचडी), चिंता विकार और खाने संबंधी मानसिक विकारों के अधिकांश मामले सामने आ चुके होते हैं।
अवसाद, मादक पदार्थों के सेवन संबंधी विकार और व्यवहार संबंधी लत जैसी समस्याएं पहले की तुलना में कम उम्र में भी सामने आ रही हैं।
भारतीय मनोरोग सोसायटी ने चेतावनी दी है कि जब मानसिक विकार शुरुआती अवस्था में होते हैं और उनका उपचार नहीं किया जाता है, तो वे अक्सर दीर्घकालिक हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति को दीर्घकालिक नुकसान होता है।
एएनसीआईपीएस-दिल्ली के आयोजन सचिव और होप केयर इंडिया के निदेशक डॉ. दीपक रहेजा ने कहा कि ये आंकड़े तत्काल कार्रवाई की मांग करते हैं।
डॉ. रहेजा ने कहा, ‘‘जब 60 प्रतिशत मानसिक विकार 35 वर्ष से कम आयु के लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत का मानसिक स्वास्थ्य संकट हमारी पिछली धारणा से कहीं अधिक तेजी से सामने आ रहा है। ये वो वर्ष हैं जब व्यक्ति पढ़ाई कर रहे होते हैं, अपना करियर बना रहे होते हैं और समाज में योगदान दे रहे होते हैं। मानसिक विकार की जल्दी पहचान, स्कूल और कॉलेज आधारित मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम; ये हमारे राष्ट्र के भविष्य की रक्षा के लिए आवश्यक हैं। ’’
आत्महत्या के आंकड़ों से युवाओं की असुरक्षा और भी स्पष्ट हो गई।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के व्यक्तियों में आत्महत्या अब मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण बन गया है।
भाषा रवि कांत रवि कांत प्रशांत
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