नयी दिल्ली, 21 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि अतिरिक्त सुनवाई अदालतों की स्थापना से न्यायिक व्यवस्था ‘‘मजबूत’’ होगी क्योंकि आरोपियों को आपराधिक मामलों में त्वरित सुनवाई या जमानत जैसी राहत पाने के लिए शीर्ष अदालत आने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
शीर्ष अदालत ने एक व्यक्ति के आईएसआईएस से संबंध से जुड़े 2021 के एक मामले में रोजाना सुनवाई के लिए छह जनवरी को केंद्र और दिल्ली सरकार से एक विशेष अदालत गठित करने पर विचार करने को कहा था। इस मामले की जांच राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) कर रहा है।
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने बुधवार को केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से राष्ट्रीय राजधानी में विशेष अदालत की स्थापना को लेकर हुई प्रगति के बारे में पूछा।
सीजेआई ने कहा, ‘‘मुख्य सवाल यह है कि एक ऐसा मजबूत तंत्र कैसे बनाया जाए जिससे उनमें से किसी को भी अदालतों में आने की जरूरत न पड़े? और ऐसा तभी संभव होगा जब अतिरिक्त अदालतें स्थापित की जाएंगी।’’
पीठ ने विधि अधिकारी से कहा कि वह यहां विशेष अदालत की स्थापना के संबंध में हुई प्रगति से उसे 10 फरवरी तक अवगत कराएं। मामले की सुनवाई 10 फरवरी को ही होगी।
पीठ मोहम्मद हेदायतुल्लाह की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिस पर आरोप है कि उसने आतंकवादी समूह आईएसआईएस की विचारधारा का भारत में प्रचार करने और अन्य लोगों की भर्ती के लिए ‘टेलीग्राम’ का इस्तेमाल किया।
सीजेआई ने पहले कहा था कि सुनवाई में अत्यधिक देरी के कारण आरोपी की ओर से ये वैध दलीलें दी जाती हैं कि उसे बिना सुनवाई के लंबे समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
पीठ ने भाटी से इस मामले में रोजाना सुनवाई के लिए यहां विशेष अदालत की स्थापना के बारे में एक सप्ताह के भीतर अवगत कराने को कहा था। इस मामले में 125 गवाहों की जांच की जानी है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने साइबर स्पेस का इस्तेमाल कर युवाओं के कट्टरपंथी बनाने से जुड़े मामले में आईएसआईएस के कथित सदस्य हेदायतुल्लाह को जमानत देने से इनकार कर दिया था।
आरोपी ने किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार करने वाले अधीनस्थ अदालत के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि किसी आतंकवादी संगठन से मात्र संबंध रखना या उसका समर्थन करना गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराध नहीं माना जाता।
उच्च न्यायालय ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा था कि गुरुग्राम स्थित सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनी में काम करने वाला हेदायतुल्लाह ‘‘निष्क्रिय’’ समर्थक नहीं था और उपलब्ध सामग्री से पता चलता है कि वह हिंसक तरीकों से भी ‘‘खिलाफत स्थापित करने के लिए जिहाद’’ की वकालत करता था।
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