(अहेली दास)
नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) पिछले दो सप्ताह में मानसून की बारिश के कारण यमुना पर स्थित हथिनीकुंड बैराज में जलप्रवाह तो बढ़ा, लेकिन नदी में छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा कई दिनों तक नहीं बढ़ाई गई। इससे दिल्ली के निचले हिस्से में यमुना की पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।
‘साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड पीपुल’ (एसएएनडीआरपी) की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मानसून शुरू होने के बाद बैराज पर पानी की आवक लगातार बढ़ी, लेकिन अतिरिक्त पानी का अधिकांश हिस्सा पश्चिमी और पूर्वी यमुना नहरों में मोड़ दिया गया। नदी में केवल गर्मियों के दौरान छोड़े जाने वाले न्यूनतम स्तर का पानी ही छोड़ा जाता रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, एक से पांच जुलाई के बीच बैराज पर औसत दैनिक जलप्रवाह लगभग 192 क्यूमेक्स से बढ़कर करीब 242 क्यूमेक्स हो गया, लेकिन नदी में छोड़ा जाने वाला पानी पूरे दिन लगभग 9.97 क्यूमेक्स (करीब 352 क्यूसेक) पर ही स्थिर रहा। यही स्थिति अगले सप्ताह भी बनी रही।
आठ और नौ जुलाई को जलप्रवाह क्रमशः लगभग 390 और 442 क्यूमेक्स तक पहुंचने के बावजूद नदी में छोड़ा गया पानी ज्यादातर समय न्यूनतम स्तर पर ही रहा। 14 जुलाई तक भी जलप्रवाह अधिक होने के बावजूद नदी में छोड़ा जाने वाला पानी फिर लगभग 9.97 क्यूमेक्स पर लौट आया।
दिल्ली में 22 किलोमीटर लंबे यमुना के हिस्से में अशोधित सीवर, औद्योगिक अपशिष्ट और शहरी बहाव मिलता है। पर्यावरणविदों का कहना है कि मानसून के दौरान पर्याप्त जलप्रवाह न मिलने से नदी की प्राकृतिक रूप से प्रदूषकों को कम करने, तलछट को बहाने और बाढ़ क्षेत्र को पुनर्भरित करने की क्षमता प्रभावित होती है।
यमुना संरक्षण कार्यकर्ता एवं एसएएनडीआरपी के सदस्य भीम सिंह रावत ने कहा कि मानसून के दौरान यदि पर्याप्त पानी नदी में छोड़ा जाए तो यमुना स्वयं को काफी हद तक साफ कर सकती है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में 352 क्यूसेक पानी छोड़ने की व्यवस्था गर्मियों के लिए तय की गई थी और इसे मानसून में जारी नहीं रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, आदर्श स्थिति में नदी को उसकी प्राकृतिक जल आवक का कम से कम 75 प्रतिशत पानी मिलना चाहिए, जबकि न्यूनतम स्थिति में भी 50 प्रतिशत पानी अवश्य छोड़ा जाना चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) ने छह वर्ष पहले यमुना के लिए न्यूनतम ‘‘812 क्यूसेक’’ पर्यावरणीय प्रवाह की सिफारिश की थी, लेकिन जल शक्ति मंत्रालय ने अब तक इसे अधिसूचित नहीं किया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सीवेज शोधन संयंत्र और प्रदूषण नियंत्रण उपाय पर्याप्त नहीं हैं; यमुना के पुनर्जीवन के लिए नदी में पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।
भाषा गोला मनीषा
मनीषा