इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माननीय शब्द पर स्थिति स्पष्ट की
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माननीय शब्द पर स्थिति स्पष्ट की
प्रयागराज, पांच मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माननीय शब्द के लिए कौन पात्र है, इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस शब्द का उपयोग संप्रभु शक्तियों का प्रयोग करने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों के नाम से पूर्व किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा, “सम्मानित ‘माननीय’ शब्द का उपयोग उन संवैधानिक पदाधिकारियों के नामों के पूर्व लगाया जाना चाहिए जो इस सरकार के तीन स्तंभों में से किसी में संप्रभु शक्तियों का प्रयोग करते हैं।”
अदालत ने 30 अप्रैल के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस सम्मानित शब्द का उपयोग किसी लोक सेवक द्वारा नहीं किया जा सकता यदि वह एक संप्रभु संवैधानिक पद पर आसीन ना हो।
पीठ ने कहा, “केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, संसद और विधानसभा के सभापति और सांसद एवं विधायक इस सम्मानित शब्द का उपयोग करने के पात्र हैं।”
अदालत ने हर्षित शर्मा नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। यह मुद्दा तब पैदा हुआ जब उप्र पुलिस ने मथुरा में दर्ज एक प्राथमिकी में भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के नाम के पूर्व माननीय शब्द नहीं लगाया।
अदालत ने अपर मुख्य सचिव (गृह) से इस खामी पर स्पष्टीकरण मांगा था जिसके जवाब में राज्य सरकार ने बताया कि दो अप्रैल को मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निर्देश जारी कर जांच करने को कहा गया था।
हलफनामा में यह भी बताया गया कि खाजन सिंह नाम के व्यक्ति द्वारा हिंदी में दिए गए शिकायती पत्र के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी और सिंह सांसद या पूर्व मंत्री के नाम के पूर्व माननीय शब्द के उपयोग संबंधी प्रोटोकॉल से अनभिज्ञ था।
यह मामला उन आरोपों से जुड़ा है जो शिकायतकर्ता खाजन सिंह ने आरोपी हर्षित शर्मा के खिलाफ लगाया है। उसका आरोप है कि शर्मा ने ठाकुर से करीबी संबंध होने का दावा करते हुए सरकारी विभाग में नौकरी दिलाने के बहाने उससे, उसके रिश्तेदारों और मित्रों से मोटी रकम वसूली।
अदालत ने कहा कि इस माननीय शब्द के उपयोग के पात्र किसी भी व्यक्ति के नाम से पूर्व स्थापित प्रोटोकॉल के मुताबिक माननीय शब्द लगाया जाना चाहिए।
भाषा राजेंद्र रंजन
रंजन

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