चेन्नई, 18 फरवरी (भाषा) न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता वाली केंद्र-राज्य संबंधों पर गठित उच्च स्तरीय समिति ने सिफारिश की है कि राज्यपालों की नियुक्ति राज्य विधानसभा द्वारा अनुमोदित नामों के आधार पर की जानी चाहिए।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा बुधवार को विधानसभा में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में समिति ने राज्यपालों के लिए पांच साल का कार्यकाल तय करने का सुझाव दिया है जिसका विस्तार नहीं किया जाए।
समिति ने कहा, ‘‘केंद्र और राज्यों के बीच एक तटस्थ संवैधानिक कड़ी के रूप में परिकल्पित राज्यपाल का कार्यालय, अपने इच्छित उद्देश्य से लगातार भटकता जा रहा है। राज्यपाल द्वारा की गई मनमानी की हर घटना – सरकार गठन या पतन में हेरफेर करना, विधानसभा को बुलाने से इनकार करना, मंजूरी को रोकना या अनिश्चित काल तक विलंबित करना, निर्वाचित सरकार की सार्वजनिक रूप से आलोचना करना या राजभवन को केंद्र में सत्तारूढ़ दल का पक्षपात करने वाला एक स्थान बनाना – इस संस्था में विश्वास को कमतर करती है।’’
समिति ने कहा कि उसका ‘दृढ़ मत’ है कि भारतीय संघवाद को अब 1991 के आर्थिक सुधारों के समान महत्वाकांक्षी संरचनात्मक पुनर्स्थापना की आवश्यकता है।
केंद्र-राज्य संबंधों पर मंथन करने के लिए 15 अप्रैल 2025 को न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता में समिति गठित की गई। इसने समकालीन संघीय चुनौतियों की विस्तृत अध्ययन करने के बाद 16 फरवरी को मुख्यमंत्री को अपनी पहली रिपोर्ट प्रस्तुत की।
समिति ने संवैधानिक ढांचे के भीतर संघीय संतुलन को बहाल करने और वास्तविक सहकारी संघवाद को मजबूत करने के उद्देश्य से कई सिफारिशें की हैं जिनमें संविधान के अनुच्छेद 155 में संशोधन करने की सिफारिश भी शामिल है ताकि ‘‘राष्ट्रपति को राज्य विधान सभा की कुल सदस्यता के बहुमत द्वारा अनुमोदित तीन नामों में से एक को राज्य के राज्यपाल के रूप में नियुक्त करने के लिए बाध्य किया जा सके।’’
समिति ने कहा कि राज्यपालों के लिए एक निश्चित, गैर-नवीकरणीय पांच वर्षीय कार्यकाल प्रदान करने के लिए अनुच्छेद 156 में संशोधन किया जाना चाहिए। उसने एक नई तेरहवीं अनुसूची ‘राज्यपालों के लिए निर्देश पत्र’ को शामिल करने की अनुशंसा की जिसमें राज्य के शीर्ष संवैधानिक पद धारक की तटस्थता सुनिश्चित करने, अधिकारों के दुरुपयोग को रोकने और संघवाद और संवैधानिक संतुलन को मजबूत करने के लिए विवेकाधिकार पर बाध्यकारी सीमाएं निर्धारित हों।
समिति ने कहा कि संघवाद कभी भी उधार लिया गया सिद्धांत या वैचारिक विलासिता नहीं था बल्कि यह एक आवश्यकता थी।
विधानसभा में बुधवार को पेश की गई रिपोर्ट के भाग-1 के पहले अध्याय में गहन विकेंद्रीकरण और बढ़ी हुई राज्य स्वायत्तता के लिए एक स्पष्ट और सैद्धांतिक संवैधानिक आधार प्रस्तुत करने वाल 11 दलीलें दी गई हैं।
रिपोर्ट में संविधान की भाषा के बारे में कहा गया, ‘‘संविधान का शायद ही कोई ऐसा भाग हो जिसमें भाषा संबंधी प्रावधानों की तुलना में सुधार की सबसे अधिक आवश्यकता हो, क्योंकि ये प्रावधान इस गलत धारणा पर आधारित हैं कि राष्ट्रीय एकता के लिए भाषाई एकरूपता आवश्यक है। तुलनात्मक अंतरराष्ट्रीय अनुभव इसके विपरीत संकेत देते हैं।’’
समिति ने कहा कि भारत को ‘एक राष्ट्र, एक भाषा’ के भ्रम को त्याग देना चाहिए, क्योंकि सच्ची एकता भाषाई एकरूपता से नहीं, बल्कि भाषाई समानता से उत्पन्न होती है। इसमें कहा गया है, ‘‘भारत की भाषा नीति निष्पक्षता, समावेशिता और हर भाषा के प्रति सम्मान पर आधारित होनी चाहिए, चाहे उसे बोलने वालों की संख्या कितनी भी हो।’’
समिति ने संविधान के अनुच्छेद 343 में भी संशोधन की सिफारिश की है ताकि अंग्रेजी को भारत की स्थायी आधिकारिक भाषा के रूप में संवैधानिक रूप से स्थापित किया जा सके और आधिकारिक भाषा अधिनियम 1963 पर इसकी निर्भरता को समाप्त किया जा सके।
इसमें संविधान के अनुच्छेद 345 में भी संशोधन करके ‘या हिंदी’ को हटाकर यह स्पष्ट करने की सिफारिश की गई है कि राज्य केवल अपने राज्य में प्रचलित भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में अपना सकते हैं।
न्यायमूर्ति जोसेफ नीत समिति ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 346 में संशोधन करके संघ और राज्यों के बीच तथा राज्यों के आपस में सभी आधिकारिक संचार के लिए अंग्रेजी को स्थायी संपर्क भाषा के रूप में स्पष्ट रूप से गारंटी दी जानी चाहिए।
समिति ने कहा, ‘‘राज्य की स्वायत्तता का उल्लंघन करने वाले अप्रचलित अनुच्छेद 347 को हटा दिया जाना चाहिए।’’
समिति ने अपनी रिपोर्ट में परिसीमन, चुनाव, शिक्षा, स्वास्थ्य और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर भी कई सिफारिशें की हैं।
भाषा धीरज माधव
माधव