असम विधानसभा चुनाव : चाय बागान मजदूरों को मजदूरी बढ़ने की आस

असम विधानसभा चुनाव : चाय बागान मजदूरों को मजदूरी बढ़ने की आस

असम विधानसभा चुनाव : चाय बागान मजदूरों को मजदूरी बढ़ने की आस
Modified Date: February 26, 2026 / 05:32 pm IST
Published Date: February 26, 2026 5:32 pm IST

( दीपक रंजन )

डिब्रूगढ़/लखीमपुर (असम), 26 फरवरी (भाषा) पीठ पर थैला बांधे, सिर को तेज धूप से बचाने के लिए कपड़ा ओढ़े बड़ी कुशलता से चाय की ‘दो पत्तियां और एक कली’ तोड़ती महिला श्रमिक असम के बागानों की सहज तस्वीर पेश करती है लेकिन ज्यादा घंटे काम और कम मजदूरी इनके जीवन को मुश्किल बनाते हैं।

इन मजदूरों की मांग है कि इनकी दिहाड़ी मजदूरी बढ़ाई जाए ताकि उनके परिवार का गुजारा ठीक से हो सके।

चाय के बागान असम में गांव के लोगों के लिए रोजी-रोटी कमाने का एक बड़ा जरिया हैं । इन बागानों में ज्यादातर महिलाएं काम करती हैं, जबकि फैक्ट्रियों में प्रसंस्करण और पैकेजिंग का काम पुरुष करते हैं।

चाय बागान मजदूर लंबे समय से मजदूरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। हर बार चुनाव के मौसम में उनकी यह उम्मीद बढ़ जाती है।

इन मजदूरों का कहना है कि उन्हें 250 रुपये की दिहाड़ी मजदूरी मिलती है जिसमें उनका रोजमर्रा का खर्च नहीं चल पाता। इनकी मांग है कि दैनिक मजदूरी को बढ़ाकर 550 रुपये किया जाना चाहिए।

लखीमपुर के कोयलामारी चाय बागान की श्रमिक हरमणि होरो ने कहा कि महंगाई बढ़ रही है, बच्चों को भी पढ़ाना है, ऐसे में कम मजदूरी में काम नहीं चल रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘हम श्रमिकों की मजदूरी बढ़ाना चाहिए, हम यह आग्रह करते हैं। सरकार से हमें जो कुछ मिलता है, उससे हमें शिकायत नहीं है लेकिन मजदूरी बढ़ाना चाहिए और इसे 550 रूपये करना चाहिए।’’

असम में चाय-बागान समुदाय एक बड़ा वोट बैंक है । उनका गहरा राजनीतिक महत्व है, वे ऊपरी असम की कई विधानसभा सीटों में मतदान का रुझान तय करते हैं।

इन मजदूरों का कहना है कि बजट में अक्सर वित्तीय आवंटन की घोषणा तो कर दी जाती है, लेकिन उन्हें लागू नहीं किया जाता है।

चाय बागान मजदूर मानते हैं कि उन्हें राशन और चिकित्सा सहायता मुहैया कराने वाली सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से कुछ सहारा जरूर मिलता है। लेकिन लगातार बढ़ते खर्च से निपटने और अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए उन्हें ज्यादा मजदूरी की जरूरत है।

चाय बागान मजदूर बीरबल गौड़ का कहना है, ‘अभी हमें जितना मिल रहा है, उससे घर चलाना मुश्किल है। थोड़ी ज्यादा मजदूरी होने से अच्छा होता। आठ घंटे काम करने पर 250 रुपये मिलते हैं । 250 रूपये में कैसे घर चलेगा ?’’

उन्होंने कहा कि हमारी मांग है कि हर दिन मजदूरी 550 रुपये मिले, तब हम लोग आगे बढ़ पायेंगे।

डिब्रूगढ़ के चाय बागान मजदूर अभिषेक चक्रवर्ती ने कहा, ‘‘ अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा हम लोगों की पुरानी मांग रही है जो अब तक पूरी नहीं हुई । यह बड़ी बात है कि भारत में दूसरे क्षेत्र में चाय बागान के जनजातीय कामगारों को ‘टी ट्राइब’ नहीं बल्कि आदिवासी कहा जाता है। वहां पर अनुसूचित जनजाति का दर्जा है लेकिन असम में नहीं है।’

उन्होंने कहा कि उन्हें भी अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाए ।

राज्य सरकार का दावा है कि चाय बागान मजदूरों के कल्याण के लिए अभूतपूर्व कदम उठाए गए हैं। सरकार को भरोसा है कि वे (मजदूर) एक बार फिर भाजपा का समर्थन करेंगे।

असम सरकार में मंत्री और डिब्रूगढ़ से विधायक प्रशांत फुकन ने दावा किया, ‘ सरकार ने चाय बागान के मजदूरों को जो सुविधाएं दी हैं, वह बीते सौ सालों में उन्हें नहीं मिली थीं । हिमंत विश्व शर्मा सरकार ने मुफ्त राशन, चिकित्सा सुविधा, वित्तीय मदद सहित कई अन्य सुविधाएं उन्हें दी हैं।’’

वहीं, असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव प्रांजल घाटोवार ने कहा कि राज्य सरकार ने वादे खूब किए थे, लेकिन उनमें से एक भी पूरा नहीं हुआ है। पिछले साल उन्होंने कहा था कि वे छात्रवृत्तियां शुरू करेंगे, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ।

कांग्रेस नेता ने कहा कि यह सरकार सिर्फ जनता का पैसा बर्बाद करेगी, ‘‘इसके अलावा, ऐसा नहीं लगता कि वे कुछ करेंगे।’’

दुनिया भर में मशहूर असम की चाय में, बागान के मजदूरों का श्रम स्वाद और खुशबू घोल देता है । असम में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। ऐसे में चाय बागान मजदूरों को उम्मीद है कि उनकी लंबे वक्त से चली आ रही मांगों पर ध्यान अवश्य दिया जाएगा।

भाषा दीपक

मनीषा

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