‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान खोवाई में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमला काला अध्याय: माणिक साहा

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‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान खोवाई में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमला काला अध्याय: माणिक साहा

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  • Publish Date - August 31, 2025 / 08:42 PM IST,
    Updated On - August 31, 2025 / 08:42 PM IST

अगरतला, 31 अगस्त (भाषा) त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने रविवार को कहा कि खोवाई में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम को सुन रहे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ताओं पर हुआ हमला देश के लिए ‘काला अध्याय’ है।

आशारामबाड़ी में 27 जुलाई को रेडियो कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से टिपरा मोथा के समर्थकों ने भाजपा के कई कार्यकर्ताओं पर हमला किया था। इस घटना में भाजपा के कम से कम सात कार्यकर्ता घायल हो गए थे। हमले में संलिप्तता के आरोप में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

मुख्यमंत्री रविवार को उसी स्थान पर प्रधानमंत्री मोदी का ‘मन की बात’ कार्यक्रम सुन रहे थे, जहां दो महीने पहले भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमला हुआ था।

साहा ने प्रधानमंत्री के रेडियो संबोधन के बाद आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, “जुलाई में प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान हुआ हमला न केवल त्रिपुरा, बल्कि पूरे देश के लिए एक काला अध्याय था। ‘मन की बात’ कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। दुनियाभर में लोग इस बात पर चर्चा करते हैं कि एक प्रधानमंत्री रेडियो कार्यक्रम के जरिये लोगों तक कैसे पहुंचता है।”

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री रेडियो कार्यक्रम के जरिये लोगों और उनके विचारों से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं। साहा ने दावा किया, “कोई भी राष्ट्राध्यक्ष ऐसा कार्यक्रम आयोजित नहीं करता।”

मुख्यमंत्री ने कहा, “जिस तरह से हमारी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हमला किया गया, उनकी संपत्तियों और वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया, वह पूरी तरह से अस्वीकार्य है। वाम मोर्चा और कांग्रेस की पिछली सरकारों के दौरान भी ऐसी घटनाएं होती थीं। अब हम ऐसी राजनीति से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं।”

साहा ने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाजपा देश के 20 राज्यों में सत्ता में है।

उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा, “जनता प्रधानमंत्री मोदी की बात सुनना चाहती है। हम राज्य के विकास के लिए उनके बताए रास्ते पर चल रहे हैं। लेकिन कुछ लोग हमेशा जनता को भ्रमित करने की कोशिश करते रहते हैं।”

भाषा जितेंद्र पारुल

पारुल