बुकर पुरस्कार जीतने के बाद से कुछ भी लिख नहीं पाई: बानू मुश्ताक

बुकर पुरस्कार जीतने के बाद से कुछ भी लिख नहीं पाई: बानू मुश्ताक

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  • Publish Date - January 16, 2026 / 03:27 PM IST,
    Updated On - January 16, 2026 / 03:27 PM IST

(माणिक गुप्ता)

जयपुर, 16 जनवरी (भाषा) लेखिका बानू मुश्ताक अपने जीवन में बदलाव लाने का श्रेय अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार को देती हैं, हालांकि उनका कहना है कि उसके बाद से वह लगातार पुस्तक समारोहों, साक्षात्कारों और यात्राओं के कारण लेखन कार्य नहीं कर सकी हैं।

जयपुर साहित्य महोत्सव (जेएलएफ) के 19वें संस्करण में बृहस्पतिवार को मुश्ताक ने स्वीकार किया कि व्यस्त कार्यक्रम का असर उनके लेखन पर पड़ा है।

उन्होंने कहा, ‘‘पुरस्कार जीतने के बाद से मुझे कुछ भी लिखने का समय नहीं मिला है। मेरा ज्यादातर समय या तो उड़ानों में या हवाई अड्डे के लाउंज में बीतता है। मैं कविताएं तक नहीं लिख पाई हूं।’’

उन्होंने बताया कि लेखन के लिए समय नहीं मिल पाने के कारण, बुकर पुरस्कार जीतने से पहले लिखी गई उनकी अधूरी आत्मकथा अभी भी पूरी नहीं हो सकी है। हालांकि, उनकी नयी रचना का इंतजार कर रहे उनके प्रशंसकों के लिए एक अच्छी खबर है। उन्होंने जल्द ही कन्नड़ में अपने सातवें लघुकथा संग्रह को प्रकाशित करने की घोषणा की।

मुश्ताक के लघुकथा संग्रह ‘‘हृदय दीप’’ (हार्ट लैंप), जिसका कन्नड़ से अंग्रेजी में दीपा भास्थी ने अनुवाद किया था, पिछले वर्ष 21 मई को प्रतिष्ठित साहित्य पुरस्कार प्राप्त करने वाली पहली कन्नड़ रचना बन गई।

पुरस्कार प्राप्त लघु कथा संग्रह में दक्षिण भारत के पितृसत्तात्मक समुदायों में रहने वाली आम महिलाओं की जीवटता, प्रतिरोध और उनके बीच सहयोग की भावना का वर्णन किया गया है, जिसे मौखिक कहानी कहने की समृद्ध परंपरा के माध्यम से जीवंत रूप से प्रस्तुत किया गया है।

मुश्ताक के लिए यह पुरस्कार व्यक्तिगत प्रशंसा से कहीं अधिक एक ‘‘जिम्मेदारी’’ है जिसने उनकी सामाजिक सक्रियता को मजबूत किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘इससे मुझे बहुत कुछ सीखने और समझने का नजरिया भी मिला है।’’

हालांकि, पुरस्कार जीतने के बाद से मुश्ताक को सबसे अधिक खुशी साहित्यिक परिदृश्य में आए बदलाव से मिली है – न केवल युवा महत्वाकांक्षी लेखकों में, बल्कि उनके माता-पिता में भी।

उन्होंने बताया, ‘‘अब माता-पिता भी अपने बच्चों के लेखक बनने के विचार के प्रति जागरूक हो रहे हैं। जैसा कि वे चाहते हैं कि उनके बच्चे पारंपरिक पेशे अपनाएं, उसी तरह अब वे उन्हें लेखक बनाने के बारे में सोच रहे हैं और इसके लिए प्रयासरत हैं।’’

उनसे जब लेखक बनने के आकांक्षियों के लिए सलाह देने का अनुरोध किया गया तो तो उनका जवाब सरल था, ‘‘सिर्फ लिखने की योजना मत बनाओ। बस लिखना शुरू कर दो।’’

पांच दिवसीय साहित्य महोत्सव में शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद, ब्रिटिश अभिनेता एवं लेखक स्टीफन फ्राई, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता अनुराधा रॉय, वरिष्ठ फिल्म समीक्षक भावना सोमाया, पूर्व राजनयिक-लेखक गोपाल कृष्ण गांधी और मनु जोसेफ, रुचिर जोशी तथा के.आर. मीरा सहित 350 से अधिक प्रख्यात लेखक और विद्वान भाग ले रहे हैं।

यह महोत्सव 19 जनवरी को समाप्त होगा।

भाषा सुभाष वैभव

वैभव