नयी दिल्ली, 27 मार्च (भाषा) सरकार ने छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और व्यापार एवं जीवन में सुगमता बढ़ाने के लिए शुक्रवार को लोकसभा में एक विधेयक पेश किया।
वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने एक संसदीय समिति की सिफारिशों को शामिल करने के बाद, जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया।
कांग्रेस सांसद के. काव्या और जी.के. पडवी ने विधेयक पेश किए जाने का विरोध करते हुए कहा कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है।
पडवी ने सरकार से विधेयक को प्रवर समिति के पास वापस भेजने या संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा, ‘‘यह एक प्रशासनिक चूक है… विधेयक मनमाना है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। इस पर पुन: विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।’’
उन्होंने यह भी कहा कि प्रवर समिति की रिपोर्ट में भी विधेयक के प्रावधानों को लेकर असहमति जताई गई है।
पडवी ने कहा कि इसमें ‘‘न्यायिक निगरानी की कमी’’ है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हनन करता है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक कानून का उल्लंघन करने का लाइसेंस देता है।
उन्होंने दावा किया, ‘‘बड़ी कंपनियां जवाबदेही से बच जाएंगी और गरीब लोग कड़े प्रवर्तन का सामना करेंगे।’’
काव्या ने कहा कि विधेयक अधिकारियों को अत्यधिक शक्तियां देता है और न्यायिक निगरानी को कमतर करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह विधेयक मनमाना है और आपराधिक न्याय प्रणाली को कमजोर करता है तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। इसके दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए विधेयक पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।’’
उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार, नियामक संस्थाओं और नागरिक समाज संगठनों सहित सभी हितधारकों के साथ पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि इस तरह का कानून लाने के लिए व्यापक विचार-विमर्श करने की जरूरत है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि विधेयक में लोगों और मजदूरों की सुरक्षा के प्रावधान किये जाएं।
वहीं, प्रसाद ने कहा कि विधेयक पर (समिति में) विस्तृत विचार-विमर्श किया गया है और इसमें केवल छोटे अपराधों को ही अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है।
मंत्री ने कहा कि यह विधेयक छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और जुर्माने और दंड को अपराध के अनुरूप संशोधित करने तथा अपीलीय प्राधिकरणों की स्थापना जैसे उपाय लागू कर व्यापार एवं जीवन में सुगमता को बढ़ावा देता है।
उन्होंने कहा, ‘‘इसमें 23 मंत्रालयों द्वारा शासित 79 केंद्रीय कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव है। यानी कि कुल 784 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।’’
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इस बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू से पूछा कि संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) में विधेयक भेजे जाने के बाद, क्या दोबारा उसे भेजा जा सकता है?
रीजीजू ने कहा कि ऐसा आज तक नहीं हुआ और ऐसा नियम में भी नहीं है और उदाहरण भी नहीं है।
प्रसाद ने कहा कि विपक्षी सदस्यों ने यह मुद्दा उठाया है कि विधेयक के प्रावधान कैद की जगह जुर्माने का प्रावधान करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि विधेयक केवल छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करता है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने पिछले वर्ष 18 मार्च को जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2025 को लोकसभा में पेश किया था, जिसे प्रवर समिति को भेजा गया था।
भाषा सुभाष हक
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