क्या गैर-श्रद्धालु भी शबरिमला मंदिर की परंपराओं को दे सकते हैं चुनौती: न्यायालय ने केंद्र से पूछा
क्या गैर-श्रद्धालु भी शबरिमला मंदिर की परंपराओं को दे सकते हैं चुनौती: न्यायालय ने केंद्र से पूछा
नयी दिल्ली, आठ अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को केंद्र से पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के शबरिमला मंदिर की परंपराओं को कैसे चुनौती दे सकते हैं।
यह टिप्पणी प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने की, जो केरल के शबरिमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं और साथ ही अलग-अलग धर्मों द्वारा प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा पर भी विचार कर रही है।
पीठ में प्रधान न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
न्यायालय ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सात सवाल खड़े किए हैं। इनमें से एक सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके उस ‘‘धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह’’ की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है।
कार्यवाही जब खत्म होने वाली थी, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह जानना चाहा कि शबरिमला मामले में याचिकाकर्ता कौन है।
उन्होंने पूछा, ‘‘आपने जो दलील दी है, उससे यह स्पष्ट होता है कि मूल याचिकाकर्ता (अयप्पा के) भक्त नहीं हैं। किसी भी श्रद्धालु ने इस न्यायालय में इसे चुनौती नहीं दी है। तो फिर, वे याचिकाकर्ता कौन हैं जो इसे चुनौती दे रहे हैं?’’
मेहता ने जवाब दिया कि मूल याचिकाकर्ता ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ नामक वकीलों का संगठन है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘वे (अयप्पा के) भक्त नहीं हैं, लेकिन हमें स्पष्टता दीजिए। क्या भगवान अयप्पा का कोई भक्त इसे चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर कर सकता है? यदि कोई गैर-श्रद्धालु, यानी वह व्यक्ति जिसका उस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, इसे चुनौती देता है, तो क्या यह न्यायालय ऐसी याचिका पर विचार कर सकता है?’’
उन्होंने कहा, ‘‘हम सभी प्रशिक्षित हैं। हम सभी निचली अदालतों में वकालत कर चुके हैं। यदि कोई मुकदमा किसी संगठन द्वारा दायर किया जाता है, तो पहला प्रश्न सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश सात नियम 11(ए) के अंतर्गत आएगा। यदि मुकदमा दायर करने का कोई आधार सिद्ध नहीं होता या कोई संबंध नहीं होता, तो वाद खारिज कर दिया जाएगा।’’
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि उन्होंने ऐसे याचिकाकर्ताओं के लिए अक्सर न्यायिक प्रणाली के ‘‘अदृश्य पीड़ितों’’ शब्द का प्रयोग किया है।
मेहता ने इसे मौन बहुमत और मुखर अल्पसंख्यक के बीच की लड़ाई बताया।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘‘नौ-सदस्यीय पीठ विरले गठित होती है। जनहित याचिका के अधिकार क्षेत्र की शुरुआत ‘बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ’ मामले में उस समय हुई थी, जब लोगों के पास अदालत तक पहुंचने का कोई साधन नहीं था। मैंने अपने लिखित निवेदनों में यह बताया है कि आज न्यायिक प्रणाली कहीं अधिक पारदर्शी हो गई है। ई-फाइलिंग के माध्यम से अब एक पत्र भी अदालत तक पहुंच सकता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘अब किसी भी वर्ग के प्रतिनिधित्व के लिए किसी दूसरे के माध्यम से प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी के पास साधन नहीं हैं, तो वे जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क कर सकते हैं और कह सकते हैं: मेरे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, मुझे सलाह दें, या मेरी ओर से उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में याचिका दायर करें।’’
मेहता ने कहा, “तो फिर, ऐसी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई क्यों की जानी चाहिए? और हम जानते हैं कि आज कई जनहित याचिकाएं प्रायोजित होती हैं। इनके पीछे कोई और होता है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालय जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करने में बहुत सावधानी बरत रहे हैं।
सितंबर 2018 में, पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने एक के मुकाबले चार के बहुमत से फैसला सुनाते हुए उस प्रतिबंध को हटा दिया था जो 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने से रोकता था।
इसके बाद, 14 नवंबर, 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय एक अन्य पीठ ने दो के मुकाबले तीन के बहुमत से, विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मुद्दे को एक वृहद पीठ के पास भेज दिया था।
भाषा आशीष सुरेश
सुरेश

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