सरकारी पैनलों में महिला वकीलों के लिए आरक्षण संबंधी याचिका पर केंद्र, राज्यों से जवाब तलब

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सरकारी पैनलों में महिला वकीलों के लिए आरक्षण संबंधी याचिका पर केंद्र, राज्यों से जवाब तलब

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  • Publish Date - May 20, 2026 / 02:07 PM IST,
    Updated On - May 20, 2026 / 02:07 PM IST

नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को सरकारी पैनल और विधि अधिकारी पदों में महिला वकीलों के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण का अनुरोध करने वाली जनहित याचिका पर केंद्र, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है।

भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता और उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह की दलीलों पर गौर किया और लाडली फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा दायर जनहित याचिका पर केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किए।

इस जनहित याचिका में केंद्र, राज्य सरकारों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) को सर्वोच्च अदालत के पैनल से लेकर स्थानीय कानूनी सहायता प्राधिकरणों तक, सभी कानूनी स्तरों पर महिलाओं के लिए न्यूनतम 30 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

अदालत की कार्रवाई शुरू होने पर सिंह ने कहा कि एससीबीए ने कानूनी पेशे में महिला वकीलों की स्थिति और प्रतिनिधित्व पर एक सर्वेक्षण किया और उसके बाद जनहित याचिका दायर की गई है।

वरिष्ठ वकील ने कहा, ‘‘उन्हें सरकारी पैनलों में शामिल किया जाना आवश्यक है।’’

प्रधान न्यायाधीश ने मंगलवार को कहा कि तेलंगाना बार एसोसिएशन के कुछ प्रतिनिधियों ने उनसे मुलाकात की और उन्हें यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां एक महिला वकील को सचिव नियुक्त किया गया है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा ‘‘ वह मुझे धन्यवाद दे रही थीं। मैंने बार की कुल संख्या के बारे में पूछा… यह 19,000 है। लगभग 8,000 (वकील) नियमित रूप से आते हैं, जिनमें से 2,000 महिलाएं हैं। अब केवल एक महिला सदस्य नियुक्त की गई है।’’

सिंह ने कहा कि एससीबीए का महिला वकीलों के सामने पेश आने वाली मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए एक अलग जनहित याचिका दायर करने का भी प्रस्ताव है।

इस याचिका में चौंकाने वाले अनुभवजन्य साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा गया है कि जहां एक ओर महिलाएं रिकॉर्ड संख्या में लॉ स्कूलों में प्रवेश ले रही हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें पेशेवर उन्नति से व्यवस्थित रूप से रोका जा रहा है।

याचिका में कहा गया, ‘‘याचिकाकर्ता, लाडली फाउंडेशन ट्रस्ट (ट्रस्ट) संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह जनहित याचिका दायर कर रहा है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय पैनल, उच्च न्यायालय पैनल, सरकारी विधि अधिकारी पद, कानूनी सहायता पैनल और सभी केंद्रीय एवं राज्य सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पैनल सहित सभी सरकारी पैनलों में महिला अधिवक्ताओं के लिए न्यूनतम 30 प्रतिशत आरक्षण या प्रतिनिधित्व के लिए उचित रिट, आदेश या निर्देश जारी करने की मांग की गई है, ताकि संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3), 19(1)(जी) और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित किया जा सके।’’

याचिका में 2022 की ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ और ‘एससीबीए’ सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा गया कि आजादी के 75 से अधिक वर्ष हो गए लेकिन किसी भी महिला को भारत का अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल नियुक्त नहीं किया गया है।

इसमें कहा गया, ‘‘ न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीवी के 1989 में उच्चतम न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश बनने के बाद से 35 वर्षों में, भारत के उच्चतम न्यायालय में केवल 11 महिलाओं को ही पदोन्नत किया गया है। वर्तमान में, सर्वोच्च अदालत में न्यायाधीशों में महिलाओं का अनुपात लगभग 5.88 प्रतिशत और उच्च न्यायालयों में लगभग 13.76 प्रतिशत है, जबकि प्रवेश स्तर के कानूनी पेशेवरों में महिलाओं का अनुपात कहीं अधिक है।’’

इसमें कहा गया है कि इन पैनलों से महिलाओं को व्यवस्थित तरीके से बाहर रखना केवल पेशेवर असमानता का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण संवैधानिक चूक है जो समानता की प्राप्ति में बाधा डालती है।

भाषा शोभना मनीषा

मनीषा