कॉजपा प्रदर्शन: उच्चतम न्यायालय ने पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए समिति के पुनर्गठन से इनकार किया

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कॉजपा प्रदर्शन: उच्चतम न्यायालय ने पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए समिति के पुनर्गठन से इनकार किया

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  • Publish Date - September 16, 2026 / 02:03 PM IST,
    Updated On - September 16, 2026 / 02:03 PM IST

नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कथित ज्यादतियों की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति के पुनर्गठन से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि समिति के खिलाफ लगाए गए आरोप केवल अटकलों और पहले से बनी धारणाओं पर आधारित हैं।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि समिति का गठन उच्चतम स्तर की निष्पक्षता और पारदर्शिता के मानकों के साथ-साथ निष्पक्ष दृष्टिकोण से उसकी सहायता के लिए किया गया है।

पीठ ने 10 सितंबर के अपने आदेश (जिसे मंगलवार को ऑनलाइन अपलोड किया गया) में कहा कि उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (एचपीईसी) अदालत के समक्ष किसी एक या दूसरे पक्ष के हितों का समर्थन करने के लिए गठित नहीं की गई है।

पीठ ने कहा, ‘‘हम समिति के गठन में कोई बदलाव करने के इच्छुक नहीं हैं, खासकर तब जब उसके पुनर्गठन का अनुरोध एचपीईसी द्वारा जांच शुरू करने से पहले ही केवल अटकलों और पूर्व धारणाओं के आधार पर व्यक्त कर दिया गया।’’

शीर्ष अदालत ने एचपीईसी को पेलेट गन के इस्तेमाल, लक्षित हिंसा और महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न के साथ-साथ दोनों पक्षों की ओर से हुई अत्यधिक हिंसा और संपत्ति के नुकसान से जुड़े मुद्दों की जांच करने को कहा।

अदालत ने कहा, ‘‘गवाहों और उन लोगों के साथ व्यवहार को लेकर जताई गई चिंताओं के संबंध में, जो एचपीईसी के समक्ष आकर अपना पक्ष रखना और अपनी शिकायतें दर्ज कराना चाहते हैं, हम समिति से अनुरोध करते हैं कि ऐसे कमजोर गवाहों को उचित सुरक्षा दी जाए और उनकी पहचान गोपनीय रखी जाए।’’

पीठ ने कहा, ‘‘यह बिना कहे स्पष्ट है कि ऐसे कमजोर गवाहों द्वारा एचपीईसी को दिए गए किसी भी बयान या प्रस्तुत किए गए साक्ष्य के संबंध में पूरी गोपनीयता बनाए रखी जाएगी। इसके लिए ऐसे गवाहों और अन्य आवश्यक पक्षों को दस्तावेज तथा साक्ष्य जमा करने की सुविधा देने के लिए एक अलग ऑनलाइन पोर्टल बनाया जा सकता है।’’

पीठ ने निर्देश दिया कि वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका गुसाईं, अधिवक्ता सी. सोलोमन के साथ, एचपीईसी के प्रतिनिधि के रूप में उसकी सहायता करेंगी और पक्षकारों के बीच स्वतंत्र मध्यस्थ की भूमिका भी निभाएंगी।

पीठ ने कहा, “इसी तरह, हम एचपीईसी से भी अनुरोध करते हैं कि वह जल्द से जल्द एक सदस्य सचिव नियुक्त करे, ताकि समिति को अपने कार्यों के निर्वहन में आवश्यक किसी भी तरह की परिवहन संबंधी या अन्य सचिवीय सहायता उपलब्ध कराई जा सके।’’

इससे पहले, एचपीईसी के पुनर्गठन का अनुरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा था कि समिति के एक सदस्य, जो एक पूर्वोत्तर राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) हैं, ‘‘हितों के टकराव’’ की स्थिति में हैं, क्योंकि वह एक ऐसे वरिष्ठ अधिकारी के करीबी मित्र हैं, जिनके खिलाफ जांच की संभावना है।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भी भूषण के विचारों का समर्थन किया था।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का विरोध किया था और शीर्ष अदालत से ऐसे आरोपों को नजरअंदाज करने का आग्रह किया था।

उच्चतम न्यायालय ने 20 जुलाई को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में निकाले गए विरोध मार्च के दौरान छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस ज्यादतियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की जांच के लिए उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (एचपीईसी) का गठन किया था। इस समिति की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।

भाषा संतोष वैभव

वैभव