(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 13 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कंपनियों और निवेशकों से अपील की कि वे दिव्यांग व्यक्तियों को शामिल करने को केवल अनुपालन का मुद्दा न मानें, बल्कि एक रणनीतिक लाभ के रूप में देखें जो व्यावसायिक प्रदर्शन, लचीलापन और सामाजिक प्रभाव को बढ़ाता है।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के नजरिए से देखा जाना चाहिए ताकि ऐसे अधिकारों की रक्षा हो और उन्हें बढ़ावा दिया जा सके।
पीठ ने कहा कि कार्यस्थल पर सच्ची समानता तभी हासिल की जा सकती है जब कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के एक पहलू के रूप में दिव्यांगता अधिकारों को सही प्रोत्साहन दिया जाए।
इसने कहा, ‘‘दिव्यांग समावेशन पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ईएसजी) ढांचे में ‘सामाजिक’ आयाम का एक महत्वपूर्ण घटक है।’’
ये टिप्पणियां ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ के अध्यक्ष को असम के तिनसुकिया जिले के मार्गेरिटा में ‘नॉर्थ ईस्टर्न कोलफील्ड्स कोल इंडिया लिमिटेड’ के कार्यालय में बहु-दिव्यांगता से पीड़ित एक महिला के लिए एक अतिरिक्त पद सृजित करने का निर्देश देते समय की गईं।
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त अपनी असाधारण संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता सुजाता बोरा को राहत दी।
बोरा ने दृष्टिबाधित वर्ग में आरक्षित उम्मीदवार के रूप में आवेदन किया था और ‘कोल इंडिया लिमिटेड’ में प्रबंधन प्रशिक्षु पद के लिए आयोजित साक्षात्कार में उत्तीर्ण हुई थीं।
उन्हें दिव्यांगता के चलते अनपयुक्त घोषित कर दिया गया था।
भाषा राजकुमार नेत्रपाल
नेत्रपाल