रास में कांग्रेस सांसद मुकुल वासनिक ने अंधेपन के इलाज में आने वाली बाधाओं का जिक्र किया
रास में कांग्रेस सांसद मुकुल वासनिक ने अंधेपन के इलाज में आने वाली बाधाओं का जिक्र किया
नयी दिल्ली, 13 मार्च (भाषा) राज्यसभा में शुक्रवार को कांग्रेस सांसद मुकुल वासनिक ने कॉर्निया में समस्या के कारण अंधेपन से पीड़ित लोगों की परेशानियों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि वर्तमान बैकलॉग को समाप्त करने और नए मामलों के इलाज के लिए भारत में प्रतिवर्ष करीब दो लाख आंखों के दान की आवश्यकता है।
वासनिक ने सुनने में समस्या का सामना करने वाले बच्चों के लिए ‘कॉक्लियर इम्प्लांट’ या उन्नत श्रवण यंत्रों (हियरिंग एड्स) के लिए सार्वभौमिक कवरेज की भी सरकार से मांग की।
उच्च सदन में शून्यकाल के दौरान उन्होंने कहा कि भारत में नेत्रहीन लोगों में से 12-15 लाख लोग खास तौर पर कॉर्निया में समस्या की वजह से अंधेपन से पीड़ित हैं। इस समस्या का समाधान नेत्र दान के माध्यम से हो सकता है।
उन्होंने बताया, “हर साल कॉर्निया में समस्या के कारण अंधेपन के लगभग 25,000 से 30,000 नए मामले आते हैं। भारत में वर्तमान वार्षिक नेत्र संग्रह लगभग 25,000 से 30,000 है। एक बात यह भी है कि दान की गई सभी आंखें प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। लगभग 60-70 प्रतिशत ही सर्जरी में उपयोग होती हैं।”
कांग्रेस सांसद ने कहा कि भारत को बैकलॉग समाप्त करने और नए मामलों के इलाज के लिए हर साल लगभग दो लाख आंखों के दान की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि भारत में विश्व का सबसे बड़ा नेत्र बैंक नेटवर्क होने के बावजूद, संग्रह और उपयोग केवल कुछ केंद्रों तक सीमित हैं। इसकी मुख्य बाधाओं में जागरूकता की कमी, पारिवारिक आपत्ति और सामाजिक-सांस्कृतिक भ्रांतियाँ शामिल हैं। उन्होंने कहा, “मैं सरकार से आग्रह करता हूँ कि इन बाधाओं को दूर करने को उच्च प्राथमिकता दी जाए।”
वासनिक ने आगे कहा कि अनुमानित 10,00,000 बच्चों को कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी या उन्नत हियरिंग एड की आवश्यकता है और प्रतिवर्ष लगभग 35,000 नए मामले सामने आते हैं।
उन्होंने कहा कि उच्च मांग के बावजूद, सरकारी योजनाओं के माध्यम से वर्तमान प्रावधान सीमित हैं, जिससे वार्षिक आवश्यकता और वास्तव में की जाने वाली सर्जरी के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
उन्होंने याद दिलाया कि 11 मार्च, 2026 को उनके एक अतारांकित प्रश्न के जवाब में बताया गया था कि सहायक उपकरण योजना (एडीआईपी) के तहत पिछले पांच वर्षों में केवल 3,809 लाभार्थियों का इलाज किया गया और खर्च लगभग 164 करोड़ रुपये रहा। वासनिक ने कहा कि लाखों बच्चे इस योजना के लाभ से वंचित रह गए हैं।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया, “ऐसी योजना बनाई जाए जिसमें सार्वभौमिक कवरेज हो, वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार वित्तीय सहायता मिले, दीर्घकालिक रखरखाव के लिए समर्पित कोष हो और इम्प्लांट प्रणाली के देशी विकास को तेज किया जाए ताकि आयात पर निर्भरता कम हो।”
भाषा मनीषा अविनाश
अविनाश

Facebook


