संवैधानिक नैतिकता आवश्यक धार्मिक प्रथाओं और मान्यताओं को तय करने का आधार नहीं : केंद्र

संवैधानिक नैतिकता आवश्यक धार्मिक प्रथाओं और मान्यताओं को तय करने का आधार नहीं : केंद्र

संवैधानिक नैतिकता आवश्यक धार्मिक प्रथाओं और मान्यताओं को तय करने का आधार नहीं : केंद्र
Modified Date: April 8, 2026 / 08:35 pm IST
Published Date: April 8, 2026 8:35 pm IST

नयी दिल्ली, आठ अप्रैल (भाषा) केंद्र ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि संविधानिक नैतिकता कभी भी किसी धर्म में आवश्यक धार्मिक प्रथाओं और मान्यताओं को तय करने के लिए न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं बन सकती। साथ ही, समलैंगिक संबंध और व्यभिचार से जुड़े प्रावधानों को इस सिद्धांत के आधार पर अपराध के दायरे से बाहर रखने वाले पूर्व के दो फैसले ‘‘अच्छा कानून’’ नहीं थे।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि संवैधानिक नैतिकता एक ‘अस्पष्ट और व्यक्तिपरक सिद्धांत’ है, और इस पर आधारित निर्णय, विदेशी कानूनी विशेषज्ञों के विचारों और मिसालों के साथ मिलकर देश में धार्मिक मान्यताओं की सत्यता का परीक्षण करने का आधार नहीं हो सकते हैं।

मेहता ने पीठ के समक्ष यह दलील दी कि इस न्यायालय द्वारा कुछ निर्णयों में संवैधानिक नैतिकता की गलत तरीके से लागू की गई अवधारणा बाद में 2018 के शबरिमला मामले के निर्णय का आधार बनी, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को केरल में पहाड़ी पर स्थित मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई, हालांकि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं।

ये दलीलें पीठ के समक्ष दी गईं जो केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं और साथ ही विभिन्न धर्मों द्वारा प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा पर भी विचार कर रही है। पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।

सॉलिसिटर जनरल ने दूसरे दिन की सुनवाई के दौरान अदालत को बताया, ‘‘संवैधानिक नैतिकता राजनीति विज्ञान का एक सिद्धांत है जिसके अनुसार पदाधिकारियों को कार्य करना चाहिए, गंभीर आपराधिक आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति को पद छोड़ना चाहिए या नहीं- ये संवैधानिक परंपराएं हैं, लेकिन न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हैं। न्यायिक समीक्षा संविधान के अनुसार ही की जानी चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि यदि कोई धार्मिक प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य से संबंधित है, तो अदालत इस पर गौर कर सकती है, लेकिन 2018 के शबरिमला फैसले में कहा गया है कि वह सामाजिक नैतिकता, जो कि भीड़ की नैतिकता है, के आधार पर फैसला नहीं करेगी, बल्कि संवैधानिक नैतिकता के आधार पर फैसला करेगी।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि सार्वजनिक नैतिकता अनुयायियों के दृष्टिकोण से होती है, और संवैधानिक नैतिकता, जो बहुत ही व्यक्तिपरक होती है, एक संवैधानिक धर्म है।

न्यायालय ने यह भी सवाल उठाया कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के शबरिमला मंदिर की परंपराओं को कैसे चुनौती दे सकते हैं।

शीर्ष अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को लेकर सात सवाल तय किए हैं। इनमें से एक सवाल यह है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा और विस्तार क्या है, और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता भी शामिल है?

मेहता ने दलील दी कि संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा एक भावना है और यह कोई सिद्धांत नहीं है जिसके आधार पर किसी कानून या धार्मिक प्रथा का परीक्षण किया जा सके।

उन्होंने कहा, ‘‘लोकतांत्रिक सिद्धांतों द्वारा शासित देश में, हमेशा बहुमत का दृष्टिकोण ही प्रबल होता है, खासकर जब किसी कानून का परीक्षण करने की बात आती है क्योंकि कानून बहुमत द्वारा ही बनाया जाता है।’

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘‘तो फिर आप उस आधार पर नैतिकता को कैसे परिभाषित करेंगे?’’

न्यायिक समीक्षा के दायरे के मुद्दे पर चर्चा करते हुए, मेहता ने व्यभिचार (जोसेफ शाइन) और समलैंगिक संबंधों (नवतेज सिंह जोहर) को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के संबंध में शीर्ष न्यायालय के 2018 के निर्णयों का हवाला दिया।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि व्यभिचार के अपराध को असंवैधानिक घोषित करना उचित था, क्योंकि यह एकतरफा और भेदभावपूर्ण था, इसमें केवल पुरुषों को ही दंडित किया जाता था जबकि इस कृत्य में लिप्त महिलाओं को नहीं।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि अदालत को संवैधानिक नैतिकता और पश्चिमी विशेषज्ञों के विचारों के मुद्दे पर गौर करने की आवश्यकता नहीं है, और व्यभिचार से संबंधित प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होने के कारण रद्द किया जा सकता था।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि जोसेफ शाइन फैसले में जेफरी ए. सेगल को एक प्रसिद्ध अमेरिकी कानूनी विद्वान के रूप में उद्धृत किया गया है। उन्होंने कहा, ‘‘यह सेगल कौन हैं? उन्हें यहां लगभग दूसरे डॉ. बी.आर. आंबेडकर के रूप में संदर्भित किया गया है?’

सुनवाई की शुरुआत में पीठ ने टिप्पणी की कि उसे किसी धर्म में अंधविश्वासपूर्ण प्रथा के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है। इससे पहले केंद्र ने यह तर्क दिया कि अदालत इस मुद्दे पर निर्णय नहीं ले सकती क्योंकि न्यायाधीश कानून के क्षेत्र में विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं।

मेहता ने व्यभिचार मामले में शीर्ष अदालत के फैसले में उद्धृत विदेशी कानून और पत्रिकाओं की आलोचना की और कहा कि अदालतों को बाध्यकारी कानून को “व्यक्तिगत और व्यक्तिपरक दृष्टिकोण” पर आधारित नहीं होना चाहिए, जो चयनित शैक्षणिक लेख, पॉडकास्ट या विदेशी नजरिये से प्रेरित हो।

उन्होंने तर्क दिया कि संविधानिक नैतिकता को न्यायिक समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र परीक्षण के रूप में मानना शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के लिए “पराया” है और इस अवधारणा को “अस्पष्ट” कहा।

सितंबर 2018 में, पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने एक के मुकाबले चार के बहुमत से फैसला सुनाते हुए उस प्रतिबंध को हटा दिया था जो 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को शबरिमला अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने से रोकता था।

इसके बाद, 14 नवंबर, 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय एक अन्य पीठ ने दो के मुकाबले तीन के बहुमत से, विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मुद्दे को एक वृहद पीठ के पास भेज दिया था।

भाषा आशीष माधव

माधव


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