अदालत ने शिशु की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाने वाली महिला को बरी किया
अदालत ने शिशु की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाने वाली महिला को बरी किया
कोच्चि, 12 जून (भाषा) केरल उच्च न्यायालय ने 2016 में 15 माह के अपने शिशु की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाने वाली एक महिला को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के प्रावधानों के आधार पर बरी करते हुए कहा कि घटना के समय महिला गंभीर मानसिक तनाव में थी और उसने अपनी जान लेने की भी कोशिश की थी।
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम में आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत सजा से संरक्षण देने के प्रावधान हैं।
केरल उच्च न्यायालय ने 2023 में सत्र अदालत द्वारा दोषी ठहराई गई महिला को अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि घटना के समय महिला गंभीर मानसिक तनाव में थी और उसने आत्महत्या का प्रयास किया था।
यह अधिनियम 2018 में लागू हुआ था। केरल उच्च न्यायालय ने पहले कहा था कि यह अधिनियम पूर्व प्रभाव से लागू होगा।
मौजूदा मामले में उच्च न्यायालय ने कहा कि जब 2021 में मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई थी तब यह अधिनियम लागू था इसलिए सत्र अदालत को इसे ध्यान में रखना चाहिए था।
न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी. और न्यायमूर्ति के. वी. जयकुमार की पीठ ने कहा कि महिला ने बड़ी संख्या में पैरासिटामोल की गोलियां खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया था, किसी धारदार वस्तु से अपनी कलाई पर चोट पहुंचाई थी और इन कृत्यों को करने से पहले एक सुसाइड नोट भी लिखा था जिससे पता चलता है कि वह गंभीर मानसिक तनाव में थी।
अदालत ने कहा, ‘‘ये परिस्थितियां प्रथम दृष्टया आत्महत्या के प्रयास के आरोप से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने अज्ञात कारणों से भारतीय दंड संहिता की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत आरोप साबित करने का गंभीर प्रयास नहीं किया।’’
पीठ ने आठ जून के अपने फैसले में कहा, ‘‘इन परिस्थितियों में हमारा विचार है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धारा 115 (आत्महत्या के प्रयास के मामले में गंभीर तनाव की धारणा) के प्रावधान इस मामले के तथ्यों पर पूरी तरह लागू होते हैं और अपीलकर्ता/आरोपी को मानसिक तनाव में माना जाएगा इसलिए उसे आईपीसी के तहत किसी भी अपराध के लिए दंडित नहीं किया जा सकता।’’
उच्च न्यायालय ने महिला की अपील स्वीकार कर ली और उसकी दोषसिद्धि एवं उम्रकैद की सजा रद्द कर दी।
अदालत ने कहा, ‘‘अपीलकर्ता/आरोपी को रिहा किया जाता है।’’
महिला ने नवंबर 2023 के सत्र अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसे फरवरी 2016 में अपने बच्चे की हत्या के लिए दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
महिला के अनुसार, शादी के बाद से ही उसका पति और ससुराल वाले उस पर किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध रखने का आरोप लगाकर तथा बच्चे के पिता को लेकर सवाल उठाकर उसे लगातार प्रताड़ित और परेशान कर रहे थे।
उसने यह भी दावा किया कि उससे और दहेज लाने की लगातार मांग की जाती थी और उसे मानसिक एवं शारीरिक क्रूरता झेलनी पड़ी।
महिला ने कहा कि इन घटनाओं के कारण उसे गंभीर मानसिक आघात पहुंचा और आखिरकार उसने 16 फरवरी, 2016 को पैरासिटामोल की 14 गोलियां खाकर आत्महत्या का प्रयास किया।
महिला ने कहा कि गोलियां खाने के बाद वह होश में नहीं थी और इसलिए उसे यह जानकारी नहीं थी कि उसकी कलाई कैसे कटी या उसके बाद बच्चे के साथ क्या हुआ।
भाषा
सिम्मी मनीषा
मनीषा

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