अदालत ने पॉक्सो मामले में व्यक्ति को अग्रिम जमानत दी, बच्चे के लिए कल्याणकारी कदमों का निर्देश

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अदालत ने पॉक्सो मामले में व्यक्ति को अग्रिम जमानत दी, बच्चे के लिए कल्याणकारी कदमों का निर्देश

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  • Publish Date - December 27, 2024 / 10:25 PM IST,
    Updated On - December 27, 2024 / 10:25 PM IST

नयी दिल्ली, 27 दिसंबर (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने नाबालिग से बलात्कार और उसे गर्भवती करने के आरोपी 21 वर्षीय युवक को अग्रिम जमानत दे दी और उसे पीड़िता से जन्मे शिशु के लिए कल्याणकारी कदम उठाने का निर्देश दिया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनु अग्रवाल ने शिशु के कल्याण के बारे में कोई निवेदन न करने के लिए आरोपी और अभियोजनकर्ता के रवैये की आलोचना की और कहा कि माता-पिता के होते हुए भी बच्चे को बालगृह में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अदालत आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसके खिलाफ दिल्ली पुलिस ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।

अदालत का 18 नवंबर का आदेश हाल में उपलब्ध हुआ।

अदालत ने कहा, ‘‘रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि अभियोजनकर्ता और याचिकाकर्ता (या आरोपी) एक रिश्ते में थे और उनके रिश्ते से एक बच्चा पैदा हुआ।’’

अदालत ने कहा कि अभियोजनकर्ता इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं थी, क्योंकि वह वयस्क होने के बाद उस युवक से शादी करना चाहती थी। यह भी देखा गया कि उस युवक ने उससे शादी करने की इच्छा जताई थी।

हालांकि, अदालत ने कहा कि आरोपी और अभियोजनकर्ता के फैसले इस तथ्य को नहीं बदल सकते कि उसने नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध स्थापित किए थे।

अदालत ने कहा, ‘‘यह तथ्य कि अभियोजनकर्ता याचिकाकर्ता से विवाह करने के लिए तैयार है, प्रथम दृष्टया दर्शाता है कि यह संबंध सहमति से बना था। यह परीक्षण का विषय है कि क्या अभियोजनकर्ता ने याचिकाकर्ता को गलत जानकारी दी थी कि वह वयस्क है।’’

अदालत ने कहा कि शिशु इस मामले में पीड़ित है, क्योंकि उसका जन्म कथित अपराध के परिणामस्वरूप हुआ था।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने कहा, ‘‘बच्चा बिना किसी गलती के कष्ट झेल रहा है और माता-पिता के बिना रहने को मजबूर है, जबकि उसके पिता और माता दोनों हैं… परेशान करने वाली बात यह है कि जब 29 अगस्त को जमानत याचिका पर सुनवाई हुई, तो याचिकाकर्ता और अभियोजनकर्ता केवल विवाह के लिए अपनी इच्छा के बारे में दलील दे रहे थे… लेकिन उनमें से किसी ने भी बच्चे के संबंध में दलील नहीं दी।’’

अदालत ने कहा कि बच्चे की मां और आरोपी के हलफनामों से यह स्पष्ट रूप से पता नहीं चलता कि वे शिशु का संरक्षण लेने के लिए तैयार हैं। अदालत ने युवक को ‘‘अगले आदेश तक अंतरिम संरक्षण’’ प्रदान करते हुए, शिशु के कल्याण के लिए उस पर कई शर्तें लगाईं।

अदालत ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता को 15 दिन के भीतर बच्चे के नाम पर दो लाख रुपये की सावधि जमा राशि जमा करनी होगी। बालगृह द्वारा बच्चे के नाम पर एक अलग खाता खोला जाएगा और याचिकाकर्ता को उक्त खाते में बच्चे के कल्याण के लिए प्रति माह 10,000 रुपये जमा करने होंगे।

भाषा आशीष अविनाश

अविनाश