न्यायालय ने तीन साल के वकालत मानदंड पर उच्च न्यायालयों, एनएलयू से प्रतिक्रिया मांगी
न्यायालय ने तीन साल के वकालत मानदंड पर उच्च न्यायालयों, एनएलयू से प्रतिक्रिया मांगी
नयी दिल्ली, 15 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए न्यूनतम तीन वर्ष के वकालत पेशा मानदंड पर सभी उच्च न्यायालयों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों और अन्य विधि विद्यालयों से राय मांगी।
उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल 20 मई को नये विधि स्नातकों को प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने से रोक दिया था और इसके लिए न्यूनतम तीन साल की वकालत करने का मानदंड निर्धारित किया था।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ बृहस्पतिवार को भूमिका ट्रस्ट द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिव्यांगजनों (पीडब्ल्यूडी) की श्रेणी से संबंधित विधि स्नातकों को न्यूनतम तीन वर्ष की वकालत करने की आवश्यकता से छूट देने का अनुरोध किया गया था।
मुख्य दलील यह थी कि दिव्यांग विधि स्नातकों को वकीलों द्वारा नौकरी पर नहीं रखा जाता है और इसलिए उनके लिए तीन साल के वकालत पेशे के मानदंड में ढील दी जानी चाहिए।
पीठ ने हालांकि कहा कि ऐसा कोई भी पात्रता मानदंड सभी कानून स्नातकों के लिए समान होना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश में विशेष रूप से सक्षम उम्मीदवारों को दी गई इसी तरह की छूट का भी मुद्दा उठाया।
अदालत ने कहा कि विशिष्ट श्रेणियों के लिए इस तरह की छूट देने से सेवा में आने के बाद छूट प्राप्त श्रेणियों के लोगों में हीन भावना पैदा हो सकती है और उसने सभी राज्यों में एक समान नियमों के लिए जोर दिया।
अदालत ने कहा, ‘‘हमें पता चला है कि इस फैसले से युवा छात्र निराश और हतोत्साहित हैं। हम राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (एनएलयू) और सभी उच्च न्यायालयों के छात्रों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने की योजना बना रहे हैं। यदि किसी भी प्रकार के बदलाव की आवश्यकता होगी, तो हम इसे सभी के लिए करेंगे।’’
अदालत ने कहा कि दिव्यांगजनों के लिए छूट की मांग करने वाले इस आवेदन के संबंध में कोई समग्र दृष्टिकोण अपनाने से पहले, देशभर के सभी उच्च न्यायालयों और एनएलयू से प्रतिक्रिया एकत्र करना, न्यूनतम तीन साल के वकालत मानदंड पर उनकी राय और सुझाव प्राप्त करना, इस मामले पर एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है।
पीठ ने कहा, ‘‘हम सभी उच्च न्यायालयों को निर्देश देते हैं कि वे इस आदेश को अपने माननीय मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष रखें। सभी उच्च न्यायालयों के साथ-साथ राष्ट्रीय विश्वविद्यालय संस्थानों और विधि विद्यालयों से अनुरोध है कि वे चार सप्ताह के भीतर अपने सुझाव दें।’’
उच्चतम न्यायालय ने 20 मई को कहा था कि युवा विधि स्नातक होते ही न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल नहीं हो सकते हैं और प्रवेश स्तर के पदों पर आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम तीन साल वकालत करना अनिवार्य है।
भाषा
देवेंद्र नरेश
नरेश

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