मजबूत उद्देश्य के अभाव में भी विश्वसनीय मृत्यु-पूर्व बयान अभियोजन के लिए पर्याप्त: न्यायालय

मजबूत उद्देश्य के अभाव में भी विश्वसनीय मृत्यु-पूर्व बयान अभियोजन के लिए पर्याप्त: न्यायालय

मजबूत उद्देश्य के अभाव में भी विश्वसनीय मृत्यु-पूर्व बयान अभियोजन के लिए पर्याप्त: न्यायालय
Modified Date: January 15, 2026 / 10:16 pm IST
Published Date: January 15, 2026 10:16 pm IST

नयी दिल्ली, 15 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि अगर किसी मामले में व्यक्ति का मृत्यु-पूर्व विश्वसनीय और भरोसेमंद अंतिम बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) मौजूद है, तो मकसद के ठोस सबूत न होने पर भी यह अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं करता।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने चमन लाल को अपनी पत्नी सरो देवी पर केरोसिन डालकर आग लगाने के मामले में बरी किए जाने के हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया और कहा कि मकसद का महत्व मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में होता है।

उच्चतम न्यायालय ने अधीनस्थ अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें चमन लाल को हत्या के आरोप में दोषी ठहराया गया था और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मृत्यु पूर्व अंतिम बयान पर संदेह जताते हुए उसे बरी किया गया था।

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उच्च न्यायालय ने मृत्यु-पूर्व अंतिम बयान पर दो कारणों से संदेह जताया था– पहला, बयान दर्ज किए जाने के समय में कथित असंगति; और दूसरा, यह संदेह कि क्या चंबा जिले के तहसीलदार-सह-कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने स्वयं यह बयान दर्ज किया या केवल इसे लिखवाया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा उठाए गए दोनों संदेह टिकाऊ नहीं हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में मकसद का महत्व प्रमुख होता है। जहां मृत्यु-पूर्व विश्वसनीय और भरोसेमंद अंतिम बयान के रूप में प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद है, वहां मकसद के ठोस प्रमाण का अभाव अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं करता।’’

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वर्तमान मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य दिखाते हैं कि प्रतिवादी ने पत्नी के साथ लगातार झगड़े किए, उसे अपमानित किया और उसके लिए “कंजरी” (बुरे चरित्र की महिला) जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए दुर्व्यवहार किया और बार-बार ससुराल से निकालने की धमकी दी।

पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि मृत्यु-पूर्व अंतिम बयान में लगातार वैवाहिक कलह और दुर्व्यवहार का उल्लेख है, जो अपराध के लिए संभावित पृष्ठभूमि प्रदान करता है।

शीर्ष अदालत ने कहा, “किसी भी स्थिति में, अभियोजन पक्ष को मकसद को बिल्कुल सटीक रूप से साबित करने की जरूरत नहीं है, और मकसद को पूरी तरह साबित न कर पाने से विश्वसनीय और ठोस मामले की ताकत कम नहीं हो जाती।”

साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के आधार पर, उच्चतम न्यायालय ने संतोष जताया कि सारो देवी का मृत्यु-पूर्व अंतिम बयान स्वैच्छिक, सच्चा और विश्वसनीय है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सात दिसंबर 2009 को चमन लाल ने हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के रामपुर गांव में अपने घर पर सरो देवी पर कथित रूप से केरोसिन छिड़कर उन्हें आग लगा दी थी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन गंभीर रूप से झुलस जाने के कारण उनकी मौत हो गई।

भाषा खारी सुरेश

सुरेश


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