नयी दिल्ली, 11 जनवरी (भाषा) वर्ष 2017 में लापरवाही से वाहन चलाने के एक मामले में (जिसमें एक साइकिल सवार की मौत हो गई थी) दोषी ठहराए गए 60 वर्षीय व्यक्ति को मामले के लंबे समय से लंबित रहने, उसकी उम्र और पारिवारिक जिम्मेदारियों को देखते हुए यहां की एक अदालत ने परिवीक्षा पर रिहा करने का आदेश दिया।
महेश चंद्र द्वारा दायर अपील पर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुरुषोत्तम पाठक ने सुनवाई की, जिन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 279 और 304ए के तहत दोषी मानते हुए सुनाई गई एक वर्ष के साधारण कारावास और अभियोजन खर्च के भुगतान की सजा को बरकरार रखा गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 12 अप्रैल, 2017 की रात को आरोपी मालवीय नगर क्षेत्र में पंचशील पार्क की ओर जाने वाले शिवालिक रोड पर लिबर्टी शोरूम के सामने लापरवाही पूर्वक एक ट्रक चला रहा था।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि ट्रक ने साइकिल सवार राम नवल को पीछे से टक्कर मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। अपीलकर्ता की ओर से सजा पर दलीलें सुनते हुए अदालत ने गौर किया कि यह घटना लगभग आठ साल पहले हुई थी और अपीलकर्ता पहले ही लंबे समय तक मुकदमे की पीड़ा झेल चुका है।
न्यायाधीश ने परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट पर भी विचार किया, जिसमें कहा गया था कि अपीलकर्ता उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ रहने वाला विवाहित व्यक्ति है और उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
अभियोजन पक्ष ने इस अपील का विरोध करते हुए तर्क दिया कि अपराध के परिणामस्वरूप एक व्यक्ति की जान चली गई, इसलिए कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।
हालांकि, अदालत ने पाया कि यद्यपि अपीलकर्ता द्वारा लापरवाही पूर्वक वाहन चलाया जाना मृत्यु का कारण बना, फिर भी 60 वर्ष की उम्र में उसे जेल भेजने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
छह जनवरी को दिए गए फैसले में अदालत ने कहा, ‘‘इस बात में कोई विवाद नहीं हो सकता कि अपीलकर्ता द्वारा लापरवाही पूर्वक वाहन चलाया जाना मृत्यु का कारण बना। लेकिन इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अपराध आठ वर्ष से अधिक समय पहले हुआ था और अपीलकर्ता पहले ही मुकदमे की पीड़ा झेल चुका है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘वह एक स्थिर जीवन जी रहा है और यदि उसे सजा सुनाई जाती है, तो वह कलंकित होगा और उसका जीवन बर्बाद हो जाएगा।’’
इसके अलावा मृतक के कानूनी प्रतिनिधियों (एलआर) और बीमा कंपनी के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत मृतक के कानूनी प्रतिनिधियों को मुआवजे के तौर पर 13.34 लाख रुपये का भुगतान किया गया था। अदालत ने कहा, ‘‘इसलिए, नरम रुख अपनाया जा सकता है।’’
भारतीय दंड संहिता की धारा 304ए के तहत उचित मामलों में परिवीक्षा देने की अनुमति देने वाले न्यायिक उदाहरणों पर भरोसा करते हुए अदालत ने सजा में संशोधन किया और निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को 30,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानतदार को पेश करने पर एक वर्ष के लिए परिवीक्षा पर रिहा किया जाए।
भाषा संतोष दिलीप
दिलीप