नयी दिल्ली, सात सितंबर (भाषा) दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के सपने संजोकर देश से आने वाले छात्र साऊथ कैंपस में प्रवेश मिलने पर सत्य निकेतन को मासिच की डिब्बी जैसे कमरे, खाने-पीने की कमी और अधिक किराया के बावजूद अपने आशियाने के तौर पर केवल एक वजह से चुनते हैं और वह संस्थान से उसकी नजदीकी।
दक्षिणी पश्चिमी दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को जो पांच मंजिला इमारत गिरी थी उसमें लड़कों का पीजी संचालित किया जाता था और इस हादसे में अबतक सात लोगों की जान जा चुकी है। इस इमारत के ढहने के से आस-पास रहने वाले छात्र न केवल अपने आस-पास की इमारतों को लेकर अनिश्चितता में हैं, बल्कि उनके मन में ये सवाल भी उभर रहे हैं कि आखिर इतनी संख्या में छात्र पीजी में क्यों रहते हैं।
अधिकतर नए छात्रों को साउथ कैंपस के पास रहने की जगह ढूंढ़ते समय सबसे पहले सत्य निकेतन का ही नाम सुनने को मिलता है। यहां की गलियों में पीजी, मेस, दुकानें और कैफे की भरमार है और मेट्रो स्टेशन व कॉलेज भी नजदीक ही हैं। कई महाविद्यालयों में छात्रावास की सुविधा नहीं है और जहां है भी, वहां जगह कम है, इसलिए छात्रों के पास चयन के अधिक विकल्प नहीं होते हैं।
यहां छात्रों के लिए उपलब्ध निवास की जगह की कीमतें अलग-अलग होती हैं।
छात्रों ने बताया कि बिना बालकनी और कम या बिना रोशन दान वाले तीन बिस्तर या चार बिस्तर वाले कमरे में एक बिस्तर का किराया लगभग 10,000 से 12,000 रुपये होता है। बेहतर रोशनदान या बालकनी वाले दो छात्रों के लिए बने कमरे का किराया लगभग 15,000 रुपये या उससे अधिक होता है, जबकि अकेले छात्र के लिए पूरा कमरा लेने के लिए 25,000 रुपये तक मासिक खर्च करना पड़ता है।
सत्य निकेतन में रहने वाले और दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज में प्रथम वर्ष के छात्र रोशन (18) ने कहा, ‘‘मैं लखनऊ से हूं और एक छात्र के साथ साझा कमरे के लिए लगभग 15,000 रुपये देता हूं। लेकिन बिना सही हवा-पानी या बालकनी वाले कमरे का किराया भी 10,000 से 12,000 रुपये तक हो सकता है। अगर आपको अकेले के लिए कमरा चाहिए, तो किराया 25,000 रुपये तक जा सकता है। थोड़ी अधिक जगह या बालकनी के लिए आपको अधिक कीमत देनी पड़ सकती है।’’
उन्होंने कहा कि जब छात्र पहली बार इन इमारतों को देखने आते हैं, तो वे बहुत अलग दिख सकती हैं।
रोशन ने कहा, ‘‘प्रत्येक शैक्षणिक सत्र में पीजी की इमारत का रंग रोगन किया जाता है। जब माता-पिता जगह देखने आते हैं, तो इमारत नयी और अच्छे रख-रखाव वाली प्रतीत होती है। अगर बालकनी या हवा-पानी का अच्छा इंतज़ाम हो, तो आप स्वाभाविक रूप से उस कमरे की ओर आकर्षित होते हैं। आपको लगता है, ‘यह अच्छी जगह है।’ लेकिन जब आप वहां रहने लगते हैं, तो पता चलता है कि फ्रिज ठीक से ठंडा नहीं करता, इंडक्शन काम नहीं करता और वॉशिंग मशीन भी शायद काम न करे।’’
जो छात्र कमरे साझा करते हैं, उनके लिए छोटी-छोटी समस्याएं भी बड़ी हो जाती है।
उत्तराखंड के रहने वाले और आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज के प्रथम वर्ष के छात्र अभिनव रमन सिन्हा (18) ने कहा, ‘‘कमरे बहुत छोटे हैं। एक कमरे में तीन लोग रह सकते हैं, लेकिन कभी-कभी छह लोग ऐसी जगहों पर रह रहे होते हैं जहां इतने लोगों को नहीं रहना चाहिए। आप उसी छोटी सी जगह में पढ़ाई करते हैं, सोते हैं और अपना सारा सामान भी रखते हैं।’’
रोशनदान उन सुविधाओं में एक है जिसके लिए छात्रों को अतिरिक्त व्यय करना पड़ सकता है।
यह इलाका जैसे-जैसे विकसित हुआ, वैसे-वैसे पीजी का केंद्र बनता गया।
दिल्ली विश्वविद्यालय का 1973 में साउथ कैंपस बनने के बाद, सत्य निकेतन और उसके आस-पास के इलाकों के घरों में श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, जीसस एंड मैरी कॉलेज और आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज जैसे कॉलेजों के छात्र रहने लगे। समय के साथ, ये घर किराए पर देने वाली वाणिज्यिक संपत्ति बन गई और छात्रों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर इनमें और अधिक बिस्तर आदि की व्यवस्था की गई।
संबंधित एक अनुमान के मुताबिक, सत्य निकेतन और उसके आस-पास के इलाके में 200 से अधिक पीजी (पेइंग गेस्ट) संचालित किए जा रहे हैं।
छात्रों का कहना है कि महाविद्यालयों में छात्रावासों की कमी इस बाजार के फलने-फूलने की वजह है।
भाषा धीरज नेत्रपाल
नेत्रपाल