नयी दिल्ली, 15 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कोमा में गए एक सैन्यकर्मी के शुक्राणु लेकर आईवीएफ प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दे दी है। इस सैनिक की तंत्रिका संबंधी स्थिति में भविष्य में भी सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है।
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने कहा कि सैनिक की पूर्व सहमति, जो उसने आईवीएफ प्रक्रिया शुरू करते समय दी थी, इस स्तर पर पर्याप्त है और पत्नी की सहमति को सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम के प्रावधानों के तहत उसकी ओर से वैध सहमति माना जाएगा।
अदालत ने यह आदेश कर्मचारी की पत्नी द्वारा दायर याचिका पर पारित किया, जिसमें उसने आईवीएफ के लिए अपने पति के शुक्राणु एकत्र करने और उसे संरक्षित कराने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया था।
याचिकाकर्ता ने कहा कि जून 2023 में, दंपति ने संतान उत्पत्ति के लिए आईवीएफ प्रक्रिया का विकल्प चुना, लेकिन जुलाई 2025 में गश्त के दौरान पति के काफी ऊंचाई से गिरने की वजह से उसके मस्तिष्क में गंभीर चोट लगी।
इसके बाद, जब सैनिक का सेना अस्पताल में इलाज किया जा रहा था, तब दंपति का आईवीएफ उपचार रोक दिया गया। इसके बाद सैनिक की पत्नी ने संविधान के तहत मातृत्व, गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता के अपने अधिकार का दावा करते हुए अदालत का रुख किया।
अदालत ने 13 अप्रैल को सुनाए गए फैसले में टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता और उसके पति ने आईवीएफ उपचार के लिए स्वेच्छा से सहमति दी थी और रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत या संकेत नहीं था जिससे यह ज्ञात हो कि पति ने सहमति नहीं दी थी।
अदालत ने फैसले में कहा कि चूंकि इस स्तर पर याचिकाकर्ता के पति की ओर से सहमति का कोई स्पष्ट संकेत नहीं था, फिर भी अधिकारियों के लिए ‘उचित, तर्कसंगत और न्यायसंगत’’है कि वे आईवीएफ प्रक्रिया को उसके तार्किक अंजाम तक ले जाने के लिए कदम उठाएं।’’
अदालत ने कहा, ‘‘इसके बिना, याचिकाकर्ता के पति द्वारा दी गई मूल सहमति अमान्य हो जाएगी, और आईवीएफ उपचार के लिए सहमत होने का मूल उद्देश्य ही निरर्थक हो जाएगा।’’
भाषा धीरज माधव
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