दिल्ली रेस क्लब और पोलो ग्राउंड खाली करने के नोटिस पर उच्च न्यायालय की रोक

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दिल्ली रेस क्लब और पोलो ग्राउंड खाली करने के नोटिस पर उच्च न्यायालय की रोक

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  • Publish Date - March 27, 2026 / 03:59 PM IST,
    Updated On - March 27, 2026 / 03:59 PM IST

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, 27 मार्च (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने ‘दिल्ली रेस क्लब’ और ‘इंडियन पोलो एसोसिएशन’ को उनके ऐतिहासिक परिसरों से बेदखल किए जाने पर रोक लगा दी है।

न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्ना ने 25 मार्च को अलग-अलग आदेश जारी कर केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय को कमाल अतातुर्क मार्ग पर दिल्ली रेस क्लब और रेस कोर्स क्षेत्र में जयपुर पोलो ग्राउंड पर ‘‘जबरन कब्जा लेने’’ से रोक दिया।

दोनों ही निकायों को 12 मार्च, 2026 को बेदखली नोटिस जारी किए गए थे।

न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्ना ने कहा, ‘‘इस अदालत के सामने जो तथ्य एवं दलील दी गई, उसके आधार पर प्रथम दृष्टया वादी के पक्ष में मामला बनता है। इसके अलावा, संतुलन कायम करने की दृष्टि से वादी के लिए राहत जरूरी है। यदि वादी को अंतरिम राहत नहीं दी जाती है तो उसे अपूरणीय क्षति होगी।’’

उच्च न्यायालय ने केंद्र पर नौ अप्रैल को अगली सुनवाई तक क्लब को बेदखल करने से रोक लगा दी।

इसने कहा कि रेस क्लब 1926 में पट्टा दिए जाने के बाद से ही 53.242 एकड़ परिसर में काम कर रहा है।

न्यायमूर्ति पुष्कर्ना ने कहा, ‘‘इस अदालत ने प्रतिवादी से स्पष्ट रूप से पूछा है कि क्या वह इस न्यायालय के समक्ष अन्य संबंधित मामले के समान ही यह बयान देगा कि वह विधिवत प्रक्रिया का सहारा लिए बिना वादी को बेदखल नहीं करेगा।’’

क्लब की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुहैल दत्त ने दलील दी कि क्लब का वैध रूप से परिसर पर कब्जा है और वह नियमित रूप से किराया दे रहा है।

उन्होंने दलील दी कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 116 के तहत क्लब ‘‘अधिग्रहण करने वाले’’ किरायेदार की श्रेणी में आता है, जिससे बेदखली नोटिस अवैध हो जाता है।

जयपुर पोलो ग्राउंड के संबंध में इंडियन पोलो एसोसिएशन (आईपीए) द्वारा दायर एक समानांतर याचिका पर उच्च न्यायालय ने कहा कि भले ही सरकार ‘‘व्यापक सार्वजनिक उद्देश्य’’ के लिए भूमि को पुनः प्राप्त करना चाहे, लेकिन उसे ‘‘कानून की उचित प्रक्रिया’’ का पालन करना होगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नायर ने आईपीए की ओर से अदालत में कहा कि कि एसोसिएशन का चार दशकों से अधिक समय से लगातार इस जमीन पर कब्जा है और मार्च 2030 तक पट्टे का भुगतान पहले ही किया जा चुका है।

हालांकि, केंद्र ने तर्क दिया कि पट्टा 1993 में समाप्त हो गया था और आईपीए केवल एक ‘‘लाइसेंसधारक’’ है, जिसे वहां रहने का कोई अधिकार नहीं है।

त्वरित बेदखली के केंद्र सरकार के प्रयास को खारिज करते हुए, अदालत ने उच्चतम न्यायालय के पिछले निर्णयों का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि सरकार स्थायी कब्जे वाले व्यक्ति को बेदखल करने के लिए बल का प्रयोग नहीं कर सकती।

अदालत ने दोनों ही मामलों में शहरी एवं आवास मामले मंत्रालय से जवाब मांगा है।

भाषा

राजकुमार नेत्रपाल

नेत्रपाल