सिर्फ आदेश गलत की वजह से न्यायिक अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती:न्यायालय

सिर्फ आदेश गलत की वजह से न्यायिक अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती:न्यायालय

सिर्फ आदेश गलत की वजह से न्यायिक अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती:न्यायालय
Modified Date: January 5, 2026 / 09:51 pm IST
Published Date: January 5, 2026 9:51 pm IST

नयी दिल्ली, पांच जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि महज इसलिए कि कोई आदेश गलत है या निर्णय में कोई त्रुटि है, किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही या अभियोजन की कठिन प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती। न्यायालय ने इसके साथ ही मध्यप्रदेश के एक जिला न्यायाधीश की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया, जिन्होंने आबकारी अधिनियम के तहत आरोपियों को जमानत देने में अलग-अलग मापदंड अपनाए थे।

शीर्ष अदालत ने कहा कि एक निडर न्यायाधीश एक स्वतंत्र न्यायपालिका की आधारशिला है, ठीक उसी तरह जैसे एक स्वतंत्र न्यायपालिका स्वयं वह नींव है जिस पर कानून का शासन टिका हुआ है।

न्यायमूर्ति जे बी परदीवाला और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी को मामलों का फैसला करने का कठिन कर्तव्य सौंपा जाता है और अनिवार्य रूप से, मामले में एक पक्ष को हार का सामना करना पड़ता है तथा वह असंतुष्ट होकर वापस लौटता है।

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पीठ ने कहा, ‘‘इनमें से असंतुष्ट तत्व, हिसाब बराबर करने की चाह में, निराधार आरोप लगा सकते हैं। निचली अदालतों पर काम का भारी दबाव होता है और वे कठिन परिस्थितियों में काम करती हैं। एक दिन में बड़ी संख्या में मामले सूचीबद्ध होते हैं और अधिकतर न्यायिक अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं।’’

न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि यह मामला न्यायिक अधिकारी निर्भय सिंह सुलिया की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को उजागर करता है, जिन्हें 27 वर्षों के बेदाग रिकॉर्ड के बाद केवल उन चार न्यायिक आदेशों के कारण सेवा से हटा दिया गया था जिनके द्वारा उन्होंने कुछ पक्षों को जमानत पर रिहा कर दिया था।

पीठ ने सुलिया की अपील को स्वीकार कर लिया, जिन्हें मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की सिफारिश पर राज्य सरकार द्वारा सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था, क्योंकि एक जांच अधिकारी ने जमानत आदेश पारित करने में भ्रष्टाचार के आरोपों में दम पाया था।

इसने कहा, ‘‘2 सितंबर, 2015 का बर्खास्तगी आदेश, 17 मार्च, 2016 का अपीलीय प्राधिकारी का आदेश और उच्च न्यायालय का विवादित आदेश सभी रद्द किए जाते हैं। अपीलकर्ता को सेवानिवृत्ति की सामान्य आयु प्राप्त होने तक सेवा में बने रहने वाला माना जाएगा।’’

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘चूंकि अपीलकर्ता को बिना किसी गलती के सेवा से बाहर रखा गया है, इसलिए हमारी राय है कि अपीलकर्ता को सभी संबंधित लाभों सहित पूरा बकाया वेतन दिया जाना चाहिए। आज से आठ सप्ताह की अवधि के भीतर 6 प्रतिशत की दर से ब्याज सहित मौद्रिक लाभ जारी किए जाएं।’’

इसने कहा, ‘‘यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि केवल किसी आदेश के गलत होने या निर्णय में त्रुटि होने के कारण, बिना किसी अन्य कारण के, किसी न्यायिक अधिकारी को अनुशासनात्मक कार्यवाही या अभियोजन की पीड़ा से न गुजरना पड़े।’’

पीठ ने अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ पीड़ित पक्षों के कहने पर तुच्छ आरोप लगाए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई और ऐसे अधिकारियों की सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘इसी कारण अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारी जमानत देने से हिचकते हैं और उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय पर जमानत याचिकाओं का बोझ बढ़ जाता है।’’

पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि बार के सदस्य भी न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ तुच्छ आरोप लगाने में लिप्त रहते हैं और उसने उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई किए जाने की चेतावनी दी।

फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि उच्च न्यायालयों को केवल परस्पर विरोधी न्यायिक आदेशों के कारण न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करते समय सावधानी बरतनी चाहिए।

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने निर्णय से सहमति जताते हुए न्यायमूर्ति विश्वनाथन द्वारा लिखे फैसले की सराहना की और कहा कि यह ‘‘बहुत साहसिक फैसला’’ है, जो ईमानदार न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में काफी मदद करेगा।

भाषा

नेत्रपाल संतोष

संतोष


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