नयी दिल्ली, 31 जुलाई (भाषा) तमिलनाडु में बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) ने संसद के मानसून सत्र के दौरान जिस तरह का रुख अपनाया है, उससे विपक्षी एकजुटता में दरार साफ नजर आ रही है और अब प्रमुख मुद्दों पर एकसाथ खड़े होना विपक्ष के लिए किसी परीक्षा की घड़ी से कम नहीं होगा।
इस साल तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के साथ जाने का फैसला किया और इस तरह से दक्षिण भारत के इस प्रमुख राज्य में उसकी राह द्रमुक से अलग हो गई।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद मानसून सत्र संसद का पहला सत्र है और इसमें द्रमुक का रुख पहले के रुख से काफी अलग नजर आ रहा है। वह विपक्ष के साथ पहले की माफिक खुलकर खड़ी नजर नहीं आ रही है।
बीते बृहस्पतिवार को राज्यसभा में लोक परीक्षा संशोधन विधेयक को पारित कराए जाने के दौरान जब विपक्षी दलों ने कथित नीट प्रश्नपत्र लीक मामले और 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के विरोध में सदन से वाकआउट किया तो द्रमुक उनके साथ नहीं गई।
इससे एक दिन पहले लोकसभा में इसी विधेयक पर चर्चा के दौरान द्रमुक सांसद दयानिधि मारन ने परीक्षा सुधारों के मुद्दे पर सरकार की आलोचना की, लेकिन संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस ज्यादती के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर सीधे हमला करने से परहेज किया। हालांकि, कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपना रहे हैं।
द्रमुक सदस्यों ने बृहस्पतिवार को लोकसभा में राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक पर चर्चा में भाग लेकर भी अलग राह अपनाई। इस चर्चा में हिस्सा लेने वाली वह एकमात्र विपक्षी पार्टी थी।
पार्टी के सांसद ए. राजा और कनिमोझी ने विधेयक का जोरदार विरोध करते हुए इसे देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के विपरीत बताया और आरोप लगाया कि यह हिंदुत्व के एजेंडे को प्रतिबिंबित करता है।
मानसून सत्र शुरू होने से पहले मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली पार्टी ने संसद में अपने लिए अलग बैठक व्यवस्था की मांग की थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया। इसे ‘इंडिया’ गठबंधन से संगठनात्मक दूरी बनाने के संकेत के रूप में देखा गया।
अलग-अलग तौर पर देखें तो इन घटनाओं को मुद्दा आधारित संसदीय रणनीति कहा जा सकता है, लेकिन सामूहिक रूप से ये इस बात का संकेत देती हैं कि द्रमुक कांग्रेस से स्पष्ट राजनीतिक दूरी बनाए रखते हुए कुछ अत्यंत संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों पर सरकार से सीधे टकराव से भी बच रही है।
उधर, द्रमुक ने अपने इन कदमों के राजनीतिक निहितार्थों को तवज्जो नहीं देने की कोशिश की है।
लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर मतदान के दौरान विपक्ष के साथ बहिर्गमन नहीं करने के बारे में पूछे जाने पर द्रमुक सांसद तिरुची शिवा ने संवाददाताओं से कहा कि उनकी पार्टी ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए थे और वह चाहती थी कि सरकार उनका जवाब दे।
उन्होंने कहा, ‘‘हमने बहिर्गमन नहीं किया। द्रमुक, डीएमडीके और कुछ अन्य दल भी सदन में मौजूद थे। हमने कुछ संशोधन पेश करने की कोशिश की, लेकिन जवाब केवल राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष को संबोधित था। हम उस जवाब से पूरी तरह असंतुष्ट हैं और निश्चित रूप से इस विधेयक से भी। द्रमुक, हमारे सहयोगी दलों और कई अन्य दलों का स्पष्ट रुख केवल एक है कि नीट को समाप्त किया जाए।’’
द्रमुक के इन कदमों का समय भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों में संसद का संख्या बल काफी बदल गया है।
तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल में टूट के बाद लोकसभा में 22 सांसदों के साथ द्रमुक निचले सदन में तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन गई है।
वहीं, राज्यसभा में उसके आठ सदस्य हैं और वह उच्च सदन में दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है।
यदि सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने से जुड़े संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को फिर से पारित कराने का प्रयास करती है तो द्रमुक की संख्या निर्णायक साबित हो सकती है।
महिला आरक्षण लागू करने से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक और इसके लिए आवश्यक संसदीय एवं विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का प्रावधान करने वाला परिसीमन विधेयक पिछले सत्र में पेश किया गया था।
हालांकि, संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई समर्थन हासिल नहीं कर सका। इसके पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े थे।
इसके बाद से दोनों सदनों में सत्तापक्ष के संख्याबल में कुछ बढ़ोतरी हुई है।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सात सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय के बाद लोकसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की संख्या 299 हो गई है। इसके बावजूद मौजूदा प्रभावी सदस्य संख्या के आधार पर संविधान संशोधन पारित कराने के लिए आवश्यक 360 मतों से वह अभी भी काफी दूर है।
तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद ‘नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) में शामिल हो चुके हैं। हालांकि, उनके औपचारिक विलय का प्रस्ताव अभी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष लंबित है।
यदि इस विलय को मंजूरी मिल जाती है तो लोकसभा में राजग की संख्या 299 से बढ़कर 319 हो जाएगी। इससे वह दो-तिहाई बहुमत के 360 के आंकड़े के और करीब पहुंच जाएगा, हालांकि तब भी उसे 41 और सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।
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