अपने बच्चों को दिल्ली मत भेजिए: सत्य निकेतन हादसे के प्रभावित परिवारों की अपील

अपने बच्चों को दिल्ली मत भेजिए: सत्य निकेतन हादसे के प्रभावित परिवारों की अपील

अपने बच्चों को दिल्ली मत भेजिए: सत्य निकेतन हादसे के प्रभावित परिवारों की अपील
Modified Date: September 8, 2026 / 08:39 pm IST
Published Date: September 8, 2026 8:39 pm IST

नयी दिल्ली, आठ सितंबर (भाषा) दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत ढहने से अपने बच्चों को हमेशा के लिए खो चुके या जिंदगी मौत के बीच झूलता देख रहे परिवारों ने बेहतर शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के सपनों के साथ कलेजे के टुकड़ों को राष्ट्रीय राजधानी भेजा था लेकिन जीवन भर की पीड़ा के साथ लौट रहे इन लोगों की जुबां से बस यहीं निकल रहा ‘‘अपने बच्चों को दिल्ली मत भेजो’’।

हादसे में मारे गए छात्रों के परिवारों ने उन्हें राष्ट्रीय राजधानी के महाविद्यालयों में पढ़ाई कराने के लिए बहुत संघर्ष किया था। लेकिन रविवार के हादसे में न केवल कई जानें गईं और परिवार बर्बाद हुए, बल्कि वे यह सोचने पर भी मजबूर हो गए कि क्या यह शहर इतने जोखिम के लायक था।

भूपेंद्र जाज ने इस हादसे में अपने बेटे अंकित को खो दिया लेकिन उसकी एक आंख दान करने का फैसला किया। उनके लिए दिल्ली बहुत निराशाजनक रही है।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘‘हम पूरी तरह निराश हैं। मैं बस सबसे यही कहना चाहता हूं कि अपने बच्चों को दिल्ली न भेजें।’’

जाज ने बताया कि अंकित को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए पांच सदस्यों के उनके परिवार ने काफी संघर्ष किया। उन्हें याद है कि इमारत गिरने के कुछ ही देर बाद, अपराह्न करीब तीन बजे उनके बेटे के एक दोस्त ने परिवार को फोन करके उसके बारे में पूछा और उन्हें चेतावनी दी कि अगर वह अब भी देवास (मध्य प्रदेश में उनका गृहनगर) में है, तो उसे उस इलाके में वापस न आने दें।’’

जाज ने बताया, ‘‘ हमने उन्हें बताया कि वह पहले ही दिल्ली के लिए निकल चुका था और सुबह ही राष्ट्रीय राजधानी पहुंचा है। उसका शव ढूंढने में ही हमें बहुत परेशानी हुई। कोई भी हमें कुछ बताने को तैयार नहीं था। उन्होंने हमें केवल दो तस्वीरें दिखाईं, जबकि वहां और भी लाशें थीं।’’

परिवार ने इस हादसे की गहन जांच की मांग की है।

परिवार को इस दुखद हादसे ने एक ऐसा फैसला लेने के लिए प्रेरित किया, जिससे उनके नुकसान को कुछ हद तक सार्थकता मिली। चिकित्सकों ने उन्हें बताया कि मलबे में दबने से अंकित की एक आंख पहले ही खराब हो चुकी थी, जबकि दूसरी आंख अब भी दान की जा सकती है।

जाज ने कहा, ‘‘हमने उसी समय तय कर लिया था कि हम उसकी आंख दान करेंगे।’’

अंकित के दादा माखनलाल जाज ने आरोप लगाया कि अधिकारियों से कोई मदद नहीं मिली। उन्होंने कहा, ‘‘यह (इमारत का गिरना) अधिकारियों की घोर लापरवाही है। ऐसी सभी जर्जर इमारतों को तुरंत खाली कराया जाना चाहिए। वहां पहुंचने के बाद हमें उसे ढूंढ़ने में बहुत परेशानी हुई क्योंकि अधिकारियों ने हमारी जरा भी मदद नहीं की।’’

माखनलाल ने कहा, ‘‘हमारी सारी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं… अब हमारे पास क्या बचा है?’’

दिल्ली के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में स्नातक पाठ्यक्रम के दूसरे साल के छात्र, 19 साल के नीरज बावा के परिवार के लिए भी बेटे को दिल्ली पढ़ाने का फैसला पीड़ा का कारण बना।

जम्मू के रहने वाले बावा अस्पताल की सघन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में गंभीर हालत में भर्ती हैं। इस घटना में उनके शरीर के निचले हिस्से में गंभीर चोटें आई हैं।

बावा के रिश्ते के भाई अशोक कुमार ने बताया कि परिवार को इस घटना के बारे में जानकारी मीडिया से मिली।

उन्होंने कहा, ‘‘ बावा के पिता सेना से अवकाश प्राप्त हैं और समाचार देख रहे थे तभी इमारत गिरने की खबर आई। शुरू में तो उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें ख्याल आया कि नीरज भी उसी इलाके में एक पीजी में रहता था। कुछ देर बाद, हमने कहीं उसकी तस्वीर देखी। हमने टैक्सी ली और तुरंत यहां के लिए रवाना हो गए।’’

कुमार ने बताया कि परिवार ने नीरज से बार-बार जम्मू में पढ़ाई करने के लिए कहा था, लेकिन वह एक अच्छे कॉलेज में पढ़ने के लिए दिल्ली आना चाहता था।

उन्होंने कहा, ‘‘ देखो दिल्ली ने उसका क्या हाल कर दिया है।’’

कुमार ने बताया कि बावा की मां की मौत करीब एक दशक पहले हो गई थी और वह चार भाई-बहनों में सबसे छोटा है। उसके पिता और तीन बहनें हमेशा उसका बहुत ध्यान रखते हैं।

बावा का मित्र और हादसे में बचा 19 वर्षीय नीतीश चिब उसी कॉलेज में वाणिज्य में स्नातक पाठ्यक्रम का द्वितीय वर्ष का छात्र हैं। वह चोटों से उबर रहा है और उम्मीद है कि उसे जल्द ही अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी।

नीतीश की मां सीमा चिब ने कहा कि उनकी बेटी पहले दिल्ली में आकर पढ़ाई करने की सोच रही थी, लेकिन उसने अब अपना मन बदल लिया है।

इमारत गिरने के बाद करीब 27 घंटे तक चला बचाव अभियान सोमवार शाम को खत्म हुआ। इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई और कई अन्य लोगों को बचा लिया गया।

भाषा धीरज नरेश

नरेश


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