निर्वाचन आयोग ने बंगाल में अधिकारियों के तबादले के खिलाफ जनहित याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया

निर्वाचन आयोग ने बंगाल में अधिकारियों के तबादले के खिलाफ जनहित याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया

निर्वाचन आयोग ने बंगाल में अधिकारियों के तबादले के खिलाफ जनहित याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया
Modified Date: March 23, 2026 / 09:32 pm IST
Published Date: March 23, 2026 9:32 pm IST

कोलकाता, 23 मार्च (भाषा) निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद उसके द्वारा कई अधिकारियों का तबादला किए जाने के खिलाफ कलकत्ता उच्च न्यायालय में दाखिल जनहित याचिका की स्वीकार्यता पर सोमवार को सवाल उठाया।

जनहित याचिका दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता अर्क कुमार नाग पेशे से वकील हैं। उन्होंने दावा किया है कि 15 मार्च को विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद से निर्वाचन आयोग ने 63 पुलिस अधिकारियों और 16 प्रशासनिक अधिकारियों सहित कुल 79 वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला किया है।

मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता ने दावा किया कि मुख्य सचिव और गृह सचिव सहित अन्य शीर्ष अधिकारियों के तबादलों से राज्य की शासन व्यवस्था में एक शून्यता पैदा हो गई है।

याचिकाकर्ता का पक्ष रखने के लिए पीठ के समक्ष पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने दावा किया कि निर्वाचन आयोग मनमाने ढंग से काम कर रहा है और राज्य में चुनाव कराने से पहले अपनी पसंद के अधिकारियों को नियुक्त कर रहा है।

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता किशोर दत्ता ने याचिकाकर्ता की दलीलों का समर्थन किया। मामले की सुनवाई कर रही पीठ में मुख्य न्यायाधीश के साथ न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन भी शामिल हैं।

निर्वाचन आयोग का पक्ष रखने के लिए पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने कहा कि आयोग की शक्तियां कानून प्रदत्त हैं और उसका पवित्र कर्तव्य स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराना है।

उन्होंने जनहित याचिका के रूप में अर्जी की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए दलील दी कि याचिकाकर्ता एक पूर्णकालिक सरकारी वकील हैं और इसलिए जनहित याचिका दायर करने के दौरान वह स्वयं के जनता का हितैषी होने का दावा नहीं कर सकते।

नायडू ने पश्चिम बंगाल के साथ भेदभाव करने के याचिकाकर्ता के दावे का खंडन करते हुए दलील दी कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और झारखंड में भी विधानसभा चुनावों के दौरान कई अधिकारियों के तबादले किए गए थे।

उन्होंने तबादलों के कारण पश्चिम बंगाल में शासन व्यवस्था में किसी प्रकार की शून्यता पैदा होने के दावे का भी खंडन करते हुए कहा कि अधिकारी भले ही बदल जाएं, लेकिन पद वही रहते हैं और शासन प्रक्रिया पहले की तरह ही चलती रहती है।

अदालत ने इस मामले की सुनवाई बुधवार तक के लिए स्थगित कर दी। उस दिन पक्षकार आगे की दलीलें पेश करेंगे।

याचिकाकर्ता अर्क कुमार नाग ने निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस मामले में प्रतिवादी बनाया तथा अदालत से अनुरोध किया है कि तबादलों को कानूनी रूप से गलत घोषित किया जाए और रद्द किया जाए।

नाग के वकील ने दावा किया कि एक ओर निर्वाचन आयोग ने आदेश दिया है कि विधानसभा चुनाव समाप्त होने तक स्थानांतरित अधिकारियों को चुनाव संबंधी कोई भी कार्य नहीं दिया जाए, जबकि दूसरी ओर आयोग ने ऐसे 23 अधिकारियों को अन्य राज्यों में पर्यवेक्षक के रूप में चुनाव ड्यूटी पर तैनात किया है।

कल्याण बनर्जी ने निर्वाचन आयोग पर मनमाने ढंग से काम करने का आरोप लगाते हुए अदालत में दलील दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त कुमार के कथित पक्षपातपूर्ण रवैये के लिए उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है।

उन्होंने दावा किया कि ‘‘पश्चिम बंगाल सरकार के प्रशासन में व्यापक बदलाव का उद्देश्य राज्य के मतदाताओं को यह विश्वास दिलाना है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन की तरह एक अलिखित आपातकाल लागू है।’’

नायडू ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने के संबंध में दी गई दलील एक अलग मुद्दा है और अदालत के समक्ष प्रस्तुत मामले से संबंधित नहीं है।

उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता को अदालत को यह बताना चाहिए कि उसे निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव के बीच हुए संवाद से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी कैसे प्राप्त हुई।

भाषा धीरज नेत्रपाल

नेत्रपाल


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