एल्गार परिषद: न्यायमूर्ति एस. चंद्रशेखर ने गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया
एल्गार परिषद: न्यायमूर्ति एस. चंद्रशेखर ने गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया
नयी दिल्ली, 21 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर ने 2018 के एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में आरोपी वकील सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई से खुद को मंगलवार को अलग कर लिया।
गाडलिंग की याचिका न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की गई थी।
पीठ के समक्ष मामला सुनवाई के लिए आने पर न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, ‘‘यह किसी दूसरी पीठ के समक्ष जाएगा, मेरे साथी न्यायाधीश को कुछ दिक्कत है।’’
न्यायमूर्ति चंद्रशेखर ऐसे तीसरे न्यायाधीश हैं जिन्होंने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है।
इससे पहले, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया था।
पिछले हफ्ते गाडलिंग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने यह मामला उठाया था और याचिका पर तत्काल सुनवाई की मांग की थी।
सिब्बल ने कहा था कि गाडलिंग साढ़े सात साल से जेल में हैं। उन्होंने मामले में जल्द सुनवाई का अनुरोध किया था।
उन्होंने अदालत को बताया कि उनकी जमानत याचिका के संबंध में पहली बार 2023 में नोटिस जारी किया गया था, लेकिन इस मामले में न्यायाधीशों के मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने की वजह से देरी हुई है। उन्होंने पीठ से मामले को जल्द सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया।
गाडलिंग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने आठ अगस्त, 2025 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई से मामले की जल्द सुनवाई का अनुरोध किया था और अपने मुवक्किल की लंबी कैद का हवाला दिया था।
ग्रोवर ने कहा था, ‘‘उच्चतम न्यायालय में जमानत याचिका पर सुनवाई 11 बार टाली जा चुकी है।’’
पिछले साल 27 मार्च को शीर्ष अदालत ने इस मामले में गाडलिंग और कार्यकर्ता ज्योति जगताप की जमानत पर सुनवाई टाल दी थी।
शीर्ष अदालत ने कार्यकर्ता महेश राउत को मिली जमानत को चुनौती देने वाली राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की याचिका पर सुनवाई भी टाल दी। बंबई उच्च न्यायालय ने राउत को जमानत दी थी लेकिन एनआईए द्वारा शीर्ष अदालत में इसे चुनौती देने की कोशिश के बाद उस आदेश पर रोक लगा दी गई थी।
गाडलिंग पर माओवादियों की मदद करने और मामले में फरार लोगों समेत कई सह-आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रचने के आरोप हैं।
उन पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष का दावा है कि गाडलिंग ने भूमिगत माओवादी विद्रोहियों को सरकारी गतिविधियों और कुछ इलाकों के नक्शों के बारे में गुप्त जानकारी दी थी।
आरोप है कि उन्होंने माओवादियों से सुरजागढ़ खदानों के संचालन का विरोध करने को कहा और कई स्थानीय लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए उकसाया।
गाडलिंग एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में भी शामिल हैं। यह मामला 31 दिसंबर 2017 को पुणे में एल्गार परिषद सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से जुड़ा है। पुलिस का दावा है कि इन भाषणों के कारण अगले दिन पुणे जिले में कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा भड़क गई थी।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि कार्यकर्ता जगताप, कबीर कला मंच (केकेएम) समूह की सक्रिय सदस्य थी। इस समूह ने एल्गार परिषद सम्मेलन में अपने नाटक के मंचन के दौरान न सिर्फ आक्रामक, बल्कि बेहद भड़काऊ नारे भी लगाए थे।
भाषा सुरभि वैभव
वैभव

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