पूर्व पुलिस अधिकारी को वीरता पुरस्कार मामले में सात अगस्त तक निकाला जाएगा समाधान: केंद्र
पूर्व पुलिस अधिकारी को वीरता पुरस्कार मामले में सात अगस्त तक निकाला जाएगा समाधान: केंद्र
नयी दिल्ली, 29 जुलाई (भाषा) केंद्र सरकार ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि वह 2003 में एक अभियान के दौरान दो डकैतों को मार गिराने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी को प्रतिष्ठित राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार प्रदान करने के मामले में सात अगस्त तक ‘‘सकारात्मक समाधान’’ पेश करेगी।
दरअसल उच्चतम न्यायालय ने केंद्र द्वारा मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश का पालन नहीं किए जाने पर 20 जुलाई को नाराजगी जताई थी, जिसमें पूर्व पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान को यह पुरस्कार प्रदान करने का निर्देश दिया गया था।
उच्चतम न्यायालय उस समय केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन द्वारा दायर आवेदन पर सुनवाई कर रहा था और उसने केंद्र को उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने के लिए 29 जुलाई तक का समय दिया था।
बुधवार को यह मामला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से मामले की सुनवाई सात अगस्त को सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं इस पर काम कर रहा हूं और कोई समाधान निकलेगा।’’
चौहान की ओर से पेश वकील ने पीठ से कहा कि वीरता पुरस्कार हर साल 14-15 अगस्त को घोषित और प्रदान किए जाते हैं, इसलिए मामले को सात अगस्त से आगे नहीं टाला जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि उसने 20 जुलाई के आदेश में स्पष्ट कर दिया था कि आगे कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा।
पीठ ने कहा, ‘‘आज सॉलिसिटर जनरल ने अनुरोध किया है कि मामले को सात अगस्त तक स्थगित किया जाए और उस तारीख तक वह इस समस्या का सकारात्मक समाधान लेकर आएंगे।’’
इसके बाद मामले को सात अगस्त के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया।
तुषार मेहता ने 20 जुलाई को शीर्ष अदालत को बताया था कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय के 25 मार्च के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है।
पीठ ने तब सवाल उठाया था कि सरकार पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के साथ-साथ अदालत के आदेश का पालन क्यों नहीं कर रही।
चौहान के वकील ने न्यायालय को बताया था कि उनके मुवक्किल 23 वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे हैं।
चौहान 2003 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के घाटीगांव थाने के प्रभारी थे। गांव में डकैतों की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद उन्होंने एक अभियान का नेतृत्व किया था। इस मुठभेड़ में दो डकैत मारे गए थे और चौहान खुद भी घायल हुए थे।
मजिस्ट्रेट जांच में उन्हें क्लीन चिट मिलने के बाद उनके नाम की सिफारिश समयपूर्व पदोन्नति और राष्ट्रपति पुलिस वीरता पदक के लिए की गई थी।
कई वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद उच्च न्यायालय ने 2018 में राज्य सरकार को उनका नाम पुरस्कार के लिए केंद्र को भेजने का निर्देश दिया।
मध्य प्रदेश सरकार ने 2019 में उनका नाम भेजा, लेकिन उसी वर्ष गृह मंत्रालय ने उनके दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद मामला फिर उच्च न्यायालय से होते हुए शीर्ष अदालत पहुंचा और उच्च न्यायालय में अवमानना कार्यवाही शुरू हुई।
अवमानना कार्यवाही के दौरान केंद्र ने एक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल कर कहा था कि राष्ट्रपति ने चौहान के लिए वीरता पदक को मंजूरी दे दी है।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस फैसले को ‘अपर्याप्त’ बताया था। अदालत ने कहा था कि वीरता पदक और राष्ट्रपति वीरता पदक अलग-अलग सम्मान हैं। उच्च न्यायालय के अनुसार राष्ट्रपति वीरता पदक एक उच्चतर सम्मान है, जबकि वीरता पदक कई कर्मियों को एक साथ प्रदान किया जाता है।
भाषा शोभना सिम्मी
सिम्मी

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