नेपाल में आई बाढ़ ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों को लेकर चिंता बढ़ाई
नेपाल में आई बाढ़ ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों को लेकर चिंता बढ़ाई
देहरादून, 27 अगस्त (भाषा) नेपाल में हाल में आयी आपदा ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन तथा हिमालयी क्षेत्र में हिमनदों एवं अचानक आने वाली बाढ़ पर इसके असर को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक मनीष मेहता का कहना है कि हिमालय में हो रहे बदलावों को सिर्फ अलग-अलग घटनाओं के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
मेहता ने उत्तराखंड में पहले आयीं केदारनाथ, ऋषिगंगा और धराली जैसी आपदाओं के कारणों का अध्ययन किया है।
मेहता के अनुसार, बढ़ते तापमान की वजह से हिमालय के कई हिमनद लगातार पीछे हट रहे हैं जिसे ‘ग्लेशियर रिट्रीट’ कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि आगे बढ़ने वाला हिमनद अपने साथ चट्टानें, मिट्टी और मलबा लाता है जबकि पीछे हटने वाला हिमनद भारी मात्रा में ढीला मलबा पीछे छोड़ जाता है।
उन्होंने कहा कि इस मलबे में स्थिरता नहीं होती है और भारी बारिश या तेज़ी से बर्फ पिघलने पर यह आसानी से ढलान से नीचे खिसक सकता है।
वैज्ञानिक ऊंचे इलाकों में बारिश और बर्फबारी के बदलते पैटर्न को लेकर भी चिंतित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जिन इलाकों में पहले मुख्य रूप से बर्फबारी होती थी, वहां अब बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी जा रही है ।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पता चलता है कि बर्फबारी वाला इलाका धीरे-धीरे ज़्यादा ऊंचाई की ओर खिसक रहा है, जबकि बारिश का दायरा भी ऊंचे इलाकों तक बढ़ रहा है।
मेहता ने साफ किया कि अगर ज़्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में कम समय में ज़ोरदार बारिश होती है, तो वहां जमा ढीला मलबा पानी से भीगकर अचानक नीचे की ओर खिसक सकता है और उसका बहाव तेज हो सकता है।
उन्होंने कहा कि कभी-कभी, ज़्यादा ऊंचाई पर बर्फ या मलबा पानी के बहाव को रोक देता है, जिससे वहां एक अस्थायी बांध जैसी स्थिति पैदा हो जाती है और जब यह टूटता है तो भारी मात्रा में पानी, पत्थर और मिट्टी तेज़ी से नीचे की ओर बहने लगते हैं।
उन्होंने कहा कि इसीलिए पहाड़ों में अचानक आने वाली बाढ़ों में पानी के साथ पत्थर, मिट्टी और भारी मात्रा में मलबा भी बहकर आता है।
उन्होंने कहा कि इस बाढ़ में आम बाढ़ के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा जोर होता है और ये अपने रास्ते में आने वाली इमारतों, सड़कों और पुलों को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
मेहता के अनुसार, केदारनाथ, धराली और नेपाल जैसी घटनाओं को हिमालय में हो रहे बड़े बदलावों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि हर आपदा का कारण अलग-अलग हो सकता है और किसी खास घटना की सटीक वजह का पता केवल वैज्ञानिक जांच से ही लगाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि हिमालय में भूस्खलन और मलबे का बहाव कोई नई बात नहीं है । उन्होंने कहा कि चूंकि हिमालय भूवैज्ञानिक रूप से एक नयी और सक्रिय पर्वत श्रृंखला है, इसलिए वहां हज़ारों सालों से ऐसी प्राकृतिक घटनाएं होती रही हैं।
उन्होंने कहा कि हालांकि जलवायु परिवर्तन के कारण अब इन घटनाओं से जुड़े जोखिमों के और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
मेहता ने कहा कि इसके अलावा, रात के तापमान में भी बदलाव देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि पहले, ज़्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में दिन और रात के तापमान में काफ़ी अंतर होता था तथा रात में तापमान गिरने से बर्फ़ पिघलने की रफ़्तार धीमी हो जाती थी ।
उन्होंने कहा कि लेकिन अब कई इलाकों में न्यूनतम तापमान बढ़ रहा है जिसके परिणामस्वरूप रात के समय भी बर्फ़ और हिमनद पिघलते रह सकते हैं ।
मेहता के मुताबिक, हिमालय में बढ़ते खतरों के लिए सिर्फ़ वैश्विक तापमान में वृद्धि को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
उन्होंने कहा कि हिमनदों का पीछे हटना, बारिश और बर्फ़बारी के पैटर्न में बदलाव, बहुत ज़्यादा बारिश, रात के तापमान में बढ़ोतरी, हिमनदों का ढीला मलबा और पहाड़ों की खड़ी ढलान आदि सब मिलकर किसी आपदा की गंभीरता को बढ़ा सकते हैं ।
मेहता ने कहा कि इस संदर्भ में, नेपाल में आई बाढ़ एक बार फिर हिमालय में हो रहे बदलावों की लगातार निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन की ज़रूरत को रेखांकित करती है, क्योंकि कभी-कभी छोटी-मोटी प्राकृतिक हलचल भी निचले इलाकों की बस्तियों के लिए बड़ी आपदा का रूप ले सकती है ।
भाषा दीप्ति शफीक राजकुमार
राजकुमार

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