रिज के संरक्षण के लिए कदम उठाए वन विभाग : दिल्ली उच्च न्यायालय

रिज के संरक्षण के लिए कदम उठाए वन विभाग : दिल्ली उच्च न्यायालय

रिज के संरक्षण के लिए कदम उठाए वन विभाग : दिल्ली उच्च न्यायालय
Modified Date: December 15, 2023 / 09:10 pm IST
Published Date: December 15, 2023 9:10 pm IST

नयी दिल्ली, 15 दिसंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि वन विभाग को रिज के संरक्षण के लिए सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए। अदालत ने पूर्व में जारी निर्देशों के बावजूद भूमि को ‘आरक्षित वन’ के रूप में अधिसूचित करने में विफल रहने के लिए अधिकारियों को लताड़ भी लगाई।

न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने अपने आदेश में कहा कि वन विभाग रिज का संरक्षक है। सिंह ने रिज की सात हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि में से केवल 96 हेक्टेयर को ‘आरक्षित वन’ क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किए जाने पर चिंता व्यक्त की।

न्यायाधीश ने कहा कि दिल्ली सरकार द्वारा दायर हलफनामा ‘पूर्ण रूप से असंतोषजनक’ है क्योंकि सरकार पूरे रिज क्षेत्र को अधिसूचित करने और अतिक्रमण मुक्त बनाने की समय-सीमा पर चुप्पी साधे हुए है।

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अदालत ने कहा, ”अदालत को ऐसा लगता है कि प्रतिवादी रिज की भूमि के संरक्षण के लिए इच्छुक नहीं है। इस अदालत को यह जानकर दुख हुआ कि यह रिज अरावली रेंज का हिस्सा है और भूमि की रक्षा के लिए हर कदम वन विभाग के अधिकार क्षेत्र और शक्ति के भीतर उठाया जाना चाहिए। ”

आदेश के मुताबिक, ”उच्चतम न्यायालय और एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) द्वारा पारित आदेशों के अनुसार उत्तरदाताओं को अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन करने और टीले क्षेत्र की भूमि के संरक्षण की आवश्यकता है लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।”

राष्ट्रीय राजधानी में स्थित यह रिज अरावली पहाड़ी श्रृंखला का हिस्सा है, जो चार क्षेत्रों दक्षिण, दक्षिण-मध्य, मध्य और उत्तर में विभाजित है। चारों जोन का कुल क्षेत्रफल लगभग 7,784 हेक्टेयर है।

न्यायाधीश ने दिल्ली सरकार के वकील से पूछा कि क्या रिज भूमि को वन क्षेत्र के रूप में अधिसूचित करने में ‘कोई समस्या’ है। उन्होंने इस मुद्दे पर सरकार की प्रतिक्रिया में इस्तेमाल किए गए ‘शब्दों’ पर भी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि अदालत के आदेशों का पालन नहीं करने की स्थिति में उन्हें संबंधित अधिकारी के खिलाफ आदेश की अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करनी होगी।

न्यायाधीश ने कहा, ”हमें बिना वन वाला शहर नहीं चाहिए। हम नहीं चाहते कि अगली पीढ़ी को यह पता न हो कि जंगल क्या होता है। दिल्ली के नागरिकों के प्रति अपना कर्तव्य निभाएं। आप क्यों कह रहे हैं ‘हो जाएगा’? मैं शब्दों से बेहद नाखुश हूं।”

भाषा जितेंद्र संतोष

संतोष


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