जयपुर, दो मार्च (भाषा) किशोरावस्था में कान के संक्रमण ने जब सुनने की शक्ति छीन ली तो विजयेश कुमार पंड्या के लिए घर और स्कूल की रौनकें अचानक खामोश हो गयीं लेकिन होंठों की ‘हलचल’ पढ़कर उन्होंने पढ़ाई जारी रखी, शिक्षक बने और वर्ष 2015 में राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) में चयन के साथ उस खामोशी को ही अपनी ताकत में बदल दिया।
प्रतापगढ़ जिले में अतिरिक्त जिलाधिकारी पंड्या ने बताया, “1996 तक मैं सामान्य रूप से सुन सकता था, लेकिन 15 वर्ष की उम्र में कान के संक्रमण ने मेरी सुनने की शक्ति छीन ली।”
उन्होंने कहा, “1996 में दसवीं, 1998 में 12वीं पास की और 2005 में तृतीय श्रेणी अध्यापक में चयन हुआ। लगातार मेहनत से 2015 में राजस्थान प्रशासनिक सेवा(आरएएस) में चयन हुआ।’’
सुनने में असमर्थ लोगों का मनोबल बढ़ाते हुए पंड्या ने कहा, “अपनी इस कमी को हताशा न बनने दें। इसे ताकत बनाकर आगे बढ़ें।”
कुछ ऐसी ही कहानी नागौर जिले के मेड़ता सिटी निवासी दिनेश के बेटे युवराज की है।
दिनेश ने बताया, “मेरा बेटा युवराज सोनी जब पांच वर्ष का था, तब उसे बुखार आया। छह महीने तक अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े। बुखार तो ठीक हो गया, लेकिन बाद में महसूस हुआ कि उसे कम सुनाई देने लगा है।”
दिनेश ने कहा, “इस बीच, युवराज ने निशानेबाजी में रुचि दिखाई। वर्ष 2023 में उसने 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा शुरू की और आज अपने जज्बे के बल पर राष्ट्रीय स्तर के लिए चयनित हो चुका है।”
जयपुर के प्रताप नगर निवासी जितेंद्र अग्रवाल ने बताया कि उनके बेटे मिलिन ने दिमागी बुखार के बाद नौ माह की उम्र में सुनने की क्षमता खो दी थी।
जितेंद्र ने कहा, “मिलिन का सपना इंजीनियर बनने का था। इस कमी के कारण स्कूल में उसके मित्र नहीं बन पाए। अलगाव के बावजूद उसने हार नहीं मानी और आज वह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है।”
जयपुर के वैशाली नगर निवासी अक्षिता कौशिक को तीन वर्ष की उम्र से सुनने में परेशानी थी।
कौशिक ने कहा, “माता-पिता को धीरे-धीरे लगा कि शायद मैं सुन नहीं पा रही हूं। उस समय मैं केवल पांच प्रतिशत ही सुन पाती थी। चिकित्सक ने कान में एक छोटी मशीन लगाई, लेकिन दस वर्ष की उम्र तक मेरी सुनने की क्षमता पूरी तरह समाप्त हो गई।”
इवेंट प्रबंधन में बीबीए कर रही कौशिक ने कहा, “उस समय मैं बहुत घबरा गई थी, लेकिन परिवार ने हौसला दिया। वही हौसला मेरी ताकत बना और मैंने पढ़ाई जारी रखी।”
इन सभी के हौसलों को पंख देने में ‘कॉक्लियर इम्प्लांट’ मुख्य कारक रहा। इन्होंने चिकित्सीय उपचार की मदद से अपनी सुनने की क्षमता वापस हासिल की और अपने सपनों को पूरा किया।
‘कॉक्लियर इम्प्लांट’ एक शल्य-चिकित्सकीय इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जो कान के क्षतिग्रस्त हिस्से को बाईपास कर सीधे श्रवण तंत्रिका को संकेत भेजता है, ताकि गंभीर रूप से सुनने में असमर्थ व्यक्ति ध्वनियां सुन सके।
सवाई मानसिंह अस्पताल के नाक-कान-गला विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. मोहनीश ग्रोवर ने बताया कि हर वर्ष सात मार्च को विश्व श्रवण दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य सुनने से जुड़ी समस्याओं के प्रति जागरुकता बढ़ाना है।
उन्होंने बताया कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, अजमेर, उदयपुर, कोटा, श्रीगंगानगर और भीलवाड़ा में अब तक करीब 1,600 से 1,700 कॉक्लियर इम्प्लांट किए जा चुके हैं।
सरकारी सहायता के बारे में उन्होंने कहा, “प्रति ऑपरेशन का खर्च लगभग आठ लाख रुपये तक आता है, जिसे राज्य सरकार वहन करती है। यदि बच्चा दो वर्ष से कम आयु का है और दोनों कानों से सुन नहीं पा रहा है, तो ऐसे बच्चों का दोनों कानों का ऑपरेशन निशुल्क कराया जाता है।”
अभिभावकों को सलाह देते हुए डॉ. ग्रोवर ने कहा, “जन्म के तुरंत बाद बच्चे की सुनने की क्षमता की जांच करानी चाहिए। कॉक्लियर इम्प्लांट जितना जल्दी कराया जाए, परिणाम उतने बेहतर होते हैं।”
उन्होंने बताया कि सरकारी नियमों के अनुसार चार वर्ष की आयु तक बच्चों का ऑपरेशन निशुल्क किया जाता है। ऑपरेशन के बाद स्पीच थैरेपी भी अत्यंत आवश्यक है और यह सुविधा भी सरकार की ओर से निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।
भाषा बाकोलिया खारी नरेश
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