अरुणा की ओर से उपहार, जिनके साथ इंसान जैसा व्यवहार नहीं हुआ: पिंकी विरानी
अरुणा की ओर से उपहार, जिनके साथ इंसान जैसा व्यवहार नहीं हुआ: पिंकी विरानी
नयी दिल्ली, 12 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय का वह फैसला जिसमें 12 साल से कोमा में रहे हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई है, अरुणा शानबाग की ओर से एक उपहार है, ‘जिनके साथ कभी इंसान जैसा व्यवहार नहीं किया गया’।
वर्ष 2011 में मुंबई की नर्स शानबाग के लिए ‘डाई टू डिगनिटी’ अभियान का नेतृत्व करने वाली पत्रकार और कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने यह बात कही।
नवंबर 1973 में हुए एक क्रूर यौन हमले के बाद शानबाग मुंबई के केईएम अस्पताल में 42 वर्षों तक कोमा जैसी स्थिति में बिस्तर पर पड़ी रहीं और 2015 में निमोनिया से उनकी मृत्यु हो गई।
इसके ग्यारह साल बाद बुधवार को उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए गाजियाबाद के 32-वर्षीय निवासी राणा के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी। राणा 2013 में गिरने से सिर में चोट लगने के बाद से कोमा में हैं। न्यायालय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली को निर्देश दिया कि जीवन रक्षक प्रणाली को एक सुनियोजित योजना के साथ हटाया जाए, ताकि उनकी गरिमा बनी रहे।
कनाडा में रहने वाले विरानी ने ‘पीटीआई वीडियो’ को बताया, ‘इन सब बातों से हमें ज्यादा मानवीय होने का एहसास हुआ है। अब आखिरकार मेरा अपना देश, उसके न्यायाधीश और उसकी सरकार मुझे संविधान के अनुसार इतना समझदार मान रहे हैं कि अगर मरीज के हित में हो तो मैं एक समझदारी भरा फैसला ले सकती हूं।’
विरानी ने आगे कहा, ‘एक भारतीय होने के नाते मुझे एक ऐसा साधन दिया गया है जिससे मुझे यह जांचना है कि मुझे इसका उपयोग करुणा के साथ करना चाहिए या नहीं। यह मुझे इंसान बनने का मौका दे रहा है। और यह अरुणा शानबाग की ओर से एक उपहार है, जिनके साथ कभी इंसान जैसा व्यवहार नहीं किया गया।’
विरानी ने 2009 में शानबाग की ओर से उच्चतम न्यायालय में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए याचिका दायर की थी। वर्ष 2011 में न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी और साथ ही सख्त दिशानिर्देशों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध घोषित कर दिया।
विरानी के अनुसार, अब जबकि अदालत ने राणा के परिवार की याचिका सुन ली है, ‘चिकित्सकों या नर्स को भगवान बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और उनके अधिकारों का सम्मान करना चाहिए’।
उन्होंने कहा, ‘यदि कानूनी तौर पर सभी प्रावधान मौजूद हैं और यदि रोगी की स्पष्ट इच्छाओं के साथ लिखित दस्तावेज भी मौजूद हैं तो मैं चिकित्सक से अनुरोध करूंगी कि वे ईश्वर बनने की कोशिश न करें, क्योंकि भगवान अब इस स्थिति से बाहर हो चुके हैं। व्यक्ति पहले ही मर चुका है, अब केवल कानूनी रूप से उसकी मृत्यु हुई है, बाकी सब कुछ समाप्त हो चुका है।’
उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए मैं चिकित्सकों और नर्स से सचमुच अनुरोध करूंगी कि वे भगवान बनने की कोशिश न करें, जैसा कि उन्होंने अरुणा शानबाग के मामले में किया था… कृपया उन्हें वही दें जिसकी उन्हें जरूरत है और जिसके वे अब हकदार हैं।’
एम्स की प्रवक्ता डॉ. रीमा दादा ने कहा कि न्यायालय के निर्देश को लागू करने के तरीके पर अस्पताल फैसला करने के लिए एक समिति गठित करेगा। विरानी ने बताया कि इस प्रक्रिया में दर्द निवारक दवाएं देने के साथ-साथ मरीज के भोजन की मात्रा को धीरे-धीरे कम करना शामिल है।
उन्होंने कहा, ‘‘जिन देशों में चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु की अनुमति है, वहां प्रक्रिया अलग-अलग है। भारत में यह काफी सरल है… अधिकतम 15 दिनों के भीतर उन्हें शाश्वत शांति प्राप्त हो जाएगी।’’
वर्ष 2011 में शानबाग के मामले के बाद गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर दायर की गई बाद की याचिकाओं ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को और सरल बना दिया है।
वर्ष 2018 में शानबाग की मृत्यु के तीन साल बाद उच्चतम न्यायालय ने ‘‘कॉमन कॉज बनाम भारत सरकार’’ मामले में अनुच्छेद 21 के तहत ‘गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार’ को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। इसने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और ‘जीवित रहने की इच्छा’ या ‘अग्रिम चिकित्सा निर्देश’ को वैध बनाया और इन निर्देशों को लागू करने के लिए सख्त प्रक्रियाएं निर्धारित कीं।
भाषा शुभम सुरेश
सुरेश

Facebook


