नयी दिल्ली, 11 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी उस याचिका के साथ केंद्र सरकार से संपर्क करे, जिसमें 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों को विनियमित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्त और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने याचिकाकर्ता, अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय को भारत सरकार के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने को कहा।
पीठ ने कहा, “हम इस रिट याचिका का निपटारा करते हुए प्रतिवादी संख्या 1 (केंद्र सरकार) को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता के दिनांक 4 फरवरी, 2026 के अभ्यावेदन पर विचार करे और उचित निर्णय ले। लिये गए निर्णय से याचिकाकर्ता को अवगत कराया जाए।”
जब उपाध्याय अपनी दलील पर अड़े रहे, तो पीठ ने कहा, ‘आप एक ऐसी पीठ के सामने हैं जिसमें बेहद रूढ़िवादी और परंपरावादी न्यायाधीश हैं। हम जल्दबाजी नहीं करते।’
पीठ ने टिप्पणी की, ‘न्याय एकतरफा नहीं होता। इसमें कार्यपालिका की भी भूमिका होती है।’
अधिवक्ता अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर याचिका में अनुच्छेद 21ए, अनुच्छेद 39(एफ), 45 और 51-ए(के) की भावना के अनुरूप 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा या धार्मिक निर्देश प्रदान करने वाले सभी संस्थानों को पंजीकृत करने, मान्यता देने, पर्यवेक्षण करने और निगरानी करने के लिए उचित कदम उठाने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत पहले से ही गारंटीकृत अधिकारों के अतिरिक्त कोई विशेष या अतिरिक्त अधिकार प्रदान नहीं करता है।
याचिका में कहा गया है, ‘यह निर्देश दिया जाए और घोषित किया जाए कि अनुच्छेद 30 अनुच्छेद 19(1)(जी) की विशिष्ट पुनरावृत्ति है और अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत नागरिकों को गारंटीकृत अधिकारों के अतिरिक्त कोई अतिरिक्त अधिकार, लाभ या विशेषाधिकार प्रदान नहीं करता है।’
इसमें कहा गया है, ‘‘याचिकाकर्ता अनुच्छेद 32 के तहत जनहित याचिका दायर करके अनुच्छेद 21ए, 39(एफ), 45 और 51-ए(के) की भावना के अनुरूप 14 वर्ष तक के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले सभी संस्थानों के पंजीकरण, मान्यता, पर्यवेक्षण और निगरानी का अपुरोध करता है।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘याचिकाकर्ता का कहना है कि बच्चे राष्ट्र के विकास का आधार हैं और अपनी कम उम्र के कारण भोले-भाले और अनुभवहीन भी होते हैं। इसलिए, राज्य की उनके प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है क्योंकि छोटे बच्चे, जो राष्ट्र का भविष्य हैं, गैर पंजीकृत संस्थानों में बहकावे में आ सकते हैं।’’
उपाध्याय ने अपनी याचिका में दावा किया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश सीमा से लगे कई जिलों का दौरा किया, जहां कथित तौर पर कई अपंजीकृत और गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान संचालित हो रहे थे।
उन्होंने कहा कि देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में बिना किसी प्रभावी निगरानी या नियामक तंत्र के अपंजीकृत और गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
भाषा अमित वैभव
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