नयी दिल्ली, 11 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम के उस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसके तहत यदि पति के खिलाफ भरण-पोषण का आदेश होने के बाद भी एक साल या उससे अधिक समय तक पति-पत्नी साथ नहीं रहते, तो केवल पत्नी को ही तलाक मांगने का अधिकार दिया गया है।
पीठ ने कहा, ‘‘जनहित याचिकाओं के माध्यम से निजी दुश्मनी निभाने की कोशिश मत कीजिए।’’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने विधि के छात्र जितेंद्र सिंह द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। सिंह ने मामले की स्वयं पैरवी की और उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक संबंधी प्रावधानों की ‘लैंगिक-तटस्थ’ व्याख्या का अनुरोध किया था।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(2)(3) केवल पत्नी को तलाक मांगने का अधिकार देती है, जहां पति के खिलाफ भरण-पोषण के आदेश के एक वर्ष या उससे अधिक समय तक सहवास फिर से शुरू नहीं हुआ है।
सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से पूछा कि वह इस प्रावधान से व्यक्तिगत रूप से कैसे प्रभावित हुए हैं।
प्रधान न्यायाधीश ने प्रश्न किया, ‘‘आप कैसे प्रभावित हुए हैं? क्या आपको लगता है कि आप पूरे पुरुष वर्ग के मुखिया हैं?’’
याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि वह पिछले सात से आठ वर्षों से वैवाहिक मुकदमों में शामिल रहा है। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान लैंगिक-तटस्थ होना चाहिए तथा पुरुषों के लिए भी समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘‘आप इस जनहित याचिका के माध्यम से व्यक्तिगत प्रतिशोध लेना चाहते हैं।’’ प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम आप पर अनुकरणीय जुर्माना क्यों न लगाएं…?’’
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि विधायिका महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने में सक्षम है और संविधान के तहत उसे ऐसा करने का अधिकार प्राप्त है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘सरकार भी महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष कानून बना सकती है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा, ‘‘मुझे उम्मीद है कि आप केवल भरण-पोषण संबंधी मुकदमे लड़ने के लिए ही कानून की पढ़ाई नहीं कर रहे हैं।’’
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता ऐसे मामलों में पूर्ण समानता चाहता है, तो ‘‘आपको संविधान में संशोधन करवाना चाहिए। यह एक विशेष कानून है’’।
भाषा शोभना सुरेश
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