सरकार को संप्रभु सत्ता के रूप में अपनी औपनिवेशिक अवधारणा को त्यागना होगा : उच्चतम न्यायालय

सरकार को संप्रभु सत्ता के रूप में अपनी औपनिवेशिक अवधारणा को त्यागना होगा : उच्चतम न्यायालय

सरकार को संप्रभु सत्ता के रूप में अपनी औपनिवेशिक अवधारणा को त्यागना होगा : उच्चतम न्यायालय
Modified Date: January 6, 2026 / 10:10 pm IST
Published Date: January 6, 2026 10:10 pm IST

नयी दिल्ली, छह जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकार को ‘‘पूर्ण विवेकाधिकार’’ के आधार पर लाभ देने वाली संप्रभु सत्ता की औपनिवेशिक सोच से बाहर आना होगा। इसके साथ ही, अदालत ने आगाह किया कि नौकरशाही की सुस्ती से उद्यमशीलता हतोत्साहित होगी।

न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि सरकार द्वारा तैयार की गई नीतियां और दिए गए अभ्यावेदन इस बात की वैध अपेक्षा पैदा करते हैं कि वह सार्वजनिक रूप से जो घोषणा करती है, उसके अनुसार कार्य करेगी।

पीठ ने कहा, ‘‘अपने सभी कार्यों के निष्पादन में, सरकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित मनमानी के विरुद्ध संवैधानिक गारंटी के अनुरूप निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कार्य करने के लिए बाध्य है।’’

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उच्चतम न्यायालय ने ओडिशा उच्च न्यायालय द्वारा दिसंबर 2018 में दिए गए फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर अपना फैसला सुनाया।

उच्च न्यायालय ने एक कंपनी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया था और औद्योगिक प्रतिष्ठान के पक्ष में 1989 की औद्योगिक नीति के तहत स्वीकृत पूंजी-निवेश सब्सिडी और डीजी-सेट सब्सिडी जैसे प्रोत्साहनों को देने से इनकार कर दिया था।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह नौकरशाही की सुस्ती का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसके कारण मुकदमे में लंबी सुनवाई हुई।

पीठ ने कहा, ‘‘इस अदालत ने अपने कई निर्णयों में विभिन्न राज्य सरकारों को याद दिलाया है कि यदि औद्योगिक नीति बनाने का उद्देश्य निवेश, रोजगार और विकास को प्रोत्साहित करना है, तो राज्य तंत्र की नौकरशाही की सुस्ती स्पष्ट रूप से उद्यमशीलता को हतोत्साहित करने वाला कारक है।’’

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नागरिकों या निजी व्यवसायों के अधिकारों में किसी भी प्रकार की कटौती सार्वजनिक हित पर आधारित आवश्यकता के अनुरूप होनी चाहिए।

अदालत ने कहा कि सार्वजनिक प्राधिकारों द्वारा किए गए प्रतिवेदनों को सबसे कड़े मानकों पर परखा जाना चाहिए, क्योंकि नागरिक सरकार पर किए गए विश्वास के आधार पर अपने कार्यों की योजना बनाते हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘पर्याप्त और ठोस औचित्य के अभाव में अधिकारियों द्वारा अपने अभ्यावेदनों का सम्मान करने में विफलता, शासन में नागरिकों के विश्वास को कमजोर करती है और सरकारी कार्रवाई की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।’’

पीठ ने कहा कि 1989 की औद्योगिक नीति को नए उद्योगों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ मौजूदा उद्योगों को समर्थन देने के दोहरे उद्देश्यों के साथ पेश किया गया था, और यह नीति एक दिसंबर, 1989 से प्रभावी हुई थी।

उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अपीलकर्ता कंपनी स्वीकृत सब्सिडी के वितरण की हकदार है। अपील को स्वीकार करते हुए, पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया।

पीठ ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सब्सिडी की स्वीकृति की तारीख से पूंजी निवेश और एक डीजी सेट के लिए नौ प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित 11,14,750 रुपये की राशि तीन महीने के भीतर अपीलकर्ता फर्म के पक्ष में वितरित करें।

भाषा आशीष अविनाश

अविनाश


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