नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) महिला समूहों, कार्यकर्ताओं और नागरिक संस्थाओं के सदस्यों ने महिलाओं के आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावित विधेयकों पर आगे बढ़ने के सरकार के तरीके को लेकर चिंता जताई है।
ये विधेयक इस सप्ताह संसद में पेश किए जाने हैं।
उन्होंने हालांकि विधानमंडलों में महिलाओं के लिए आरक्षण के सिद्धांत का एक बार फिर समर्थन किया है।
महिला संगठनों और व्यक्तियों के एक समूह ने सांसदों को संबोधित एक खुले पत्र में कहा कि यह कदम ‘जल्दबाजी’ में उठाया गया है, क्योंकि राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और आदर्श आचार संहिता लागू है।
पत्र में कहा गया है, ‘हम राज्य चुनावों के बीच जल्दबाजी में यह संयुक्त सत्र आहूत किए जाने की निंदा करते हैं।’
पत्र में कहा गया है, ‘सरकार ने महिलाओं के समूहों को अपनी सिफारिशें रखने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया।’
इस याचिका पर 95 शहरों और जिलों से 488 कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए हैं। प्रमुख हस्ताक्षरकर्ताओं में अमु जोसेफ, अंजना प्रकाश, कल्पना कनबीरन, रोमिला थापर, नंदिनी सुंदर, उर्वशी बुटालिया और योगेंद्र यादव जैसे नाम शामिल हैं।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने तर्क दिया कि यदि इस सत्र का ध्यान केवल ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में ‘आवश्यक संशोधनों’ तक सीमित रखा जाए, तो इससे ‘कुछ सकारात्मक परिणाम’ हासिल हो सकते हैं।
उन्होंने महिलाओं के आरक्षण को जनगणना के परिणामों और परिसीमन से जोड़ने वाले सभी संदर्भों को हटाने के लिए कानून में एक संशोधन का सुझाव दिया।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने विशेष रूप से आरक्षित सीटों की पहचान को लेकर निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी चिंता जताई है और ‘संस्था की निष्पक्षता को लेकर गंभीर संदेह’ व्यक्त किया।
उन्होंने सुझाव दिया कि यह प्रक्रिया विशेष राज्य समितियों द्वारा की जाए, जिनमें निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के प्रतिनिधि शामिल हों, और कम से कम एक-तिहाई सदस्य महिलाएं हों।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के लिए मसौदा विधेयकों को मंजूरी दी है। प्रस्तावित बदलावों में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करना शामिल है, जिनमें से 273 सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
जोहेब प्रशांत
प्रशांत