जीआरएसई ने स्वदेशी समुद्री अनुसंधान पोत ‘सागर मंथन’ का जलावतरण किया

जीआरएसई ने स्वदेशी समुद्री अनुसंधान पोत ‘सागर मंथन’ का जलावतरण किया

जीआरएसई ने स्वदेशी समुद्री अनुसंधान पोत ‘सागर मंथन’ का जलावतरण किया
Modified Date: September 9, 2026 / 04:31 pm IST
Published Date: September 9, 2026 4:31 pm IST

कोलकाता, नौ सितंबर (भाषा) गार्डन रिसर्च शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने बुधवार को स्वदेशी समुद्री अनुसंधान पोत ‘सागर मंथन’ का जलावतरण किया, जिसे राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर) के लिए बनाया जा रहा है। इस घटनाक्रम को गहरे समुद्र में वैज्ञानिक खोज और अनुसंधान की भारत की क्षमताओं में इजाफा करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 840 करोड़ रुपये की लागत वाले इस अनुसंधान पोत के 2028 की शुरुआत तक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध हो जाने की संभावना है।

पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह ने पोत के जलावतरण और नामकरण के अवसर पर जीआरएसई तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

जलावतरण समारोह में मौजूद पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव श्रीनिवास कुमार तुम्माला ने कहा कि यह पोत सरकार के ‘डीप ओशन मिशन’ के तहत बनाया जा रहा है और इससे हिंद महासागर क्षेत्र तथा उसे परे गहरे समुद्र में वैज्ञानिक अनुसंधान को अंजाम देने की भारत की क्षमता में काफी वृद्धि होगी।

तुम्माला ने कहा, “यह पोत हमारे वैज्ञानिक समुदाय की क्षमताओं को बढ़ाएगा, ताकि वे हिंद महासागर क्षेत्र और उन सभी जगहों पर जाकर अनुसंधान कर सकें, जहां हमारी वैज्ञानिक शोध करने में दिलचस्पी है।”

जीआरएसई के प्रबंध निदेशक कमोडोर (सेवानिवृत्त) पीआर हरि ने बताया कि ‘सागर मंथन’ के निर्माण की शुरुआत के महज पांच महीने के बाद कोलकाता में जीआरएसई के ऋषि बंकिम शिपयार्ड में इसका जलावतरण किया गया, जो निर्धारित समय से पहले जहाज निर्माण के महत्वपूर्ण चरणों को पूरा करने की शिपयार्ड की क्षमता को दर्शाता है।

अधिकारियों के मुताबिक, 89.5 मीटर लंबे और 18.8 मीटर चौड़े इस पोत का सकल टन भार (पोत के भीतर की कुल जगह) 5,900 टन है और यह अपनी अधिकतम क्षमता के 90 प्रतिशत स्तर पर बिना किसी नुकसान के लगातार 14 नॉट की रफ्तार से चल सकेगा।

तुम्माला ने बताया कि ‘सागर मंथन’ में अत्याधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियां लगाई जाएंगी, जो भारत को समुद्र विज्ञान और भूभौतिकीय अनुसंधान को अंजाम देने की “अद्वितीय” क्षमता प्रदान करेंगी।

उन्होंने बताया कि यह पोत ‘सब-बॉटम प्रोफाइलर’, भूकंपीय हलचल भांपने वाले उपकरण और अत्याधुनिक समुद्र विज्ञान संबंधी प्रणालियों की मदद से माप और सर्वेक्षण कार्य करने में सक्षम होगा।

तुम्माला के अनुसार, वायुमंडलीय अवलोकन के लिए ‘सागर मंथन’ में एक अत्याधुनिक डॉप्लर मौसम रडार भी लगाया जाएगा।

उन्होंने बताया कि इस पोत को बेहद खराब समुद्री परिस्थितियों में भी संचालन के लिए तैयार किया गया है और यह भूमध्यरेखीय हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी, दक्षिणी महासागर और अंटार्कटिका के आसपास के समुद्री क्षेत्र में अनुसंधान करने में सक्षम होगा।

जीआरएसई ने कहा कि ‘सागर मंथन’ छह किलोमीटर तक की गहराई में ‘अंडरवे स्वाथ मल्टीबीम’ और ‘भूभौतिकीय भूकंपीय सर्वेक्षण’ करने में सक्षम होगा।

कंपनी ने बताया कि यह पोत विद्युत चालकता, तापमान और गहराई (सीडीटी) मापने के साथ-साथ पानी के नमूने एकत्र करने का भी काम करेगा, जिसमें ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज जालों का इस्तेमाल करके जैविक नमूने लेना भी शामिल है।

तुम्माला ने कहा कि ‘सागर मंथन’ हिंद महासागर क्षेत्र में मैंगनीज नोड्यूल्स और पॉलीमेटैलिक सल्फाइड्स जैसे समुद्री खनिज संसाधनों का पता लगाने की भारत की कोशिशों में मदद देगा।

भाषा पारुल नरेश

नरेश


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