गुजरात: अवैध रूप से बंधक बनाने के मामले में पूर्व आईपीएस अधिकारी कुलदीप शर्मा के खिलाफ वारंट जारी

गुजरात: अवैध रूप से बंधक बनाने के मामले में पूर्व आईपीएस अधिकारी कुलदीप शर्मा के खिलाफ वारंट जारी

गुजरात: अवैध रूप से बंधक बनाने के मामले में पूर्व आईपीएस अधिकारी कुलदीप शर्मा के खिलाफ वारंट जारी
Modified Date: October 10, 2025 / 09:42 pm IST
Published Date: October 10, 2025 9:42 pm IST

भुज, 10 अक्टूबर (भाषा) गुजरात के भुज शहर की एक सत्र अदालत ने पूर्व आईपीएस अधिकारी कुलदीप शर्मा के खिलाफ वारंट जारी किया है, क्योंकि वह 1984 के गलत तरीके से बंधक बनाने और हमला करने के मामले में उच्च न्यायालय से स्थगन आदेश या जमानत प्राप्त करने में विफल रहे थे, जिसमें उन्हें पहले तीन महीने की कैद की सजा सुनाई गई थी।

शिकायतकर्ता के वकील आरएस गढ़वी ने बताया कि सत्र न्यायाधीश दिलीप महिदा की अदालत ने बृहस्पतिवार को शर्मा की हिरासत के लिए वारंट जारी किया, क्योंकि वह 1984 के मामले में 15 दिन के भीतर उच्च न्यायालय से स्थगन आदेश या जमानत प्राप्त करने में विफल रहे। इस मामले में उन्हें इस साल फरवरी में तीन महीने की कैद की सजा सुनाई गई थी।

शर्मा ने पहले निचली अदालत में अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील दायर की थी, जिसे 24 सितंबर को खारिज कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय में आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए समय दिये जाने का अनुरोध करते हुए एक आवेदन दायर किया था।

गढ़वी ने बताया कि अदालत ने उन्हें स्थगन आदेश या जमानत लेने के लिए 15 दिन का समय दिया था।

गढ़वी ने बताया कि यह अवधि आठ अक्टूबर को समाप्त हो गई, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने उनके खिलाफ वारंट जारी करने के लिए सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

यह मामला कांग्रेस नेता अब्दुल हाजी इब्राहिम (अब दिवंगत) पर हमले से संबंधित है, जिन्होंने पुलिस द्वारा निर्दोष लोगों को कथित रूप से परेशान किये जाने का मुद्दा उठाया था।

मई, 1984 में जब यह घटना हुई थी, तब शर्मा कच्छ जिले के पुलिस अधीक्षक थे।

अदालत ने पूर्व पुलिस निरीक्षक जीएच वासवदा को भी तीन महीने की कैद की सजा सुनाई थी।

उच्च न्यायालय ने शर्मा और वासवदा पर 1,000-1,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। अदालत ने दोनों को 1984 में इब्राहिम को उनके कार्यालय में गलत तरीके से बंधक बनाने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 342 के तहत दोषी ठहराया गया था।

चार दशक पुराने मामले की सुनवाई में तेजी तब आई जब उच्चतम न्यायालय ने भुज की अदालत को तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था।

भाषा देवेंद्र धीरज

धीरज


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