ज्ञानेश कुमार यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त नहीं होते, तो मैं उनकी उंगली काट देता: कल्याण बनर्जी

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ज्ञानेश कुमार यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त नहीं होते, तो मैं उनकी उंगली काट देता: कल्याण बनर्जी

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  • Publish Date - March 6, 2026 / 08:18 PM IST,
    Updated On - March 6, 2026 / 08:18 PM IST

कोलकाता, छह मार्च (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने शुक्रवार को यह टिप्पणी करके एक राजनीतिक विवाद उत्पन्न कर दिया कि अगर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार संवैधानिक पद पर नहीं होते, तो वह उनकी ‘‘उंगली काट देते’’। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग के प्रमुख ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ ‘बहुत खराब’ व्यवहार किया।

तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने यह टिप्पणी निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद मतदाता सूचियों से कथित तौर पर मनमाने तरीके से नाम हटाए जाने के विरोध में राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा कोलकाता में आयोजित एक रैली में समर्थकों को संबोधित करते हुए की।

पिछले महीने जब मुख्यमंत्री एसआईआर के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए कुमार से मिलने नयी दिल्ली गई थीं, उस वक्त कुमार और बनर्जी के बीच हुए कथित विवाद का उल्लेख करते हुए श्रीरामपुर से सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा, ‘सीईसी ने उनके साथ (ममता के साथ) बहुत बुरा बर्ताव किया। उन्होंने मुख्यमंत्री पर उंगली उठाने की हिम्मत की। अगर वह सीईसी ना होते, तो मैं उसी दिन उनकी उंगली काट देता।’

कल्याण बनर्जी के इस बयान पर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं आईं, विपक्षी नेताओं ने संवैधानिक प्राधिकार के खिलाफ इस्तेमाल की गई भाषा की आलोचना की।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा, ‘‘ये टिप्पणी तृणमूल कांग्रेस की मानसिकता को दर्शाती हैं, जिसे लोकतंत्र या संवैधानिक संस्थाओं का कोई सम्मान नहीं है।’

पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में मतदाता सूचियों के हालिया पुनरीक्षण को लेकर कल्याण बनर्जी निर्वाचन आयोग के सबसे मुखर आलोचकों में से एक रहे हैं।

एक मार्च को, तृणमूल कांग्रेस नेता ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े मामलों के निपटारे में हो रही देरी पर चिंता जतायी थी और दावा किया था कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बावजूद लाखों मामले लंबित हैं।

निर्वाचन आयोग द्वारा एसआईआर के बाद मतदाता सूची के प्रकाशित होने के कुछ दिनों बाद ही सत्तारूढ़ दल ने इस विरोध प्रदर्शन से राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया है। इन मतदाता सूचियों ने राज्य के मतदाताओं की संरचना में काफी बदलाव ला दिया है।

गत 28 फरवरी को जारी आधिकारिक आंकड़े के अनुसार, पिछले साल नवंबर में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद से लगभग 63.66 लाख नाम – यानी लगभग 8.3 प्रतिशत मतदाता – हटा दिए गए हैं, जिससे मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ से कुछ अधिक रह गई है।

भाषा अमित दिलीप

दिलीप