‘वन’ की परिभाषा की संवैधानिक वैधता तक ही केंद्रित रहेगी सुनवाई : उच्चतम न्यायालय
‘वन’ की परिभाषा की संवैधानिक वैधता तक ही केंद्रित रहेगी सुनवाई : उच्चतम न्यायालय
नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि वह खुद को वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 के तहत ‘‘वन’’ की परिभाषा की संवैधानिक वैधता को चुनौती दिये जाने तक ही सीमित रखेगा और यह स्पष्ट किया कि अलग-अलग भूखंडों से जुड़े विवादों का निस्तारण उच्च न्यायालय करेंगे।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सेवानिवृत्त वन अधिकारी अशोक शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
शर्मा ने 2023 के कानून में ‘‘वन’’ की परिभाषा की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी है कि यह उच्चतम न्यायालय द्वारा 1996 में दी गई परिभाषा को कमजोर करती है।
पीठ ने कहा, ‘‘हम टीएन गोदावर्मन मामले में 1996 में इस न्यायालय द्वारा दी गई वन की परिभाषा को आधार मान रहे हैं। हालांकि, संसद के पास अपने अधिकार क्षेत्र में परिभाषा तय करने की शक्ति है। हम उसका सम्मान करते हैं और हमें यह देखना होगा कि क्या इसमें कोई विरोधाभास है।’’
याचिकाकर्ताओं की दलील है कि गोदावर्मन मामले के आदेश के अनुसार, ‘‘वन’’ की परिभाषा को शब्दकोश के अर्थ में समझा जाना चाहिए, लेकिन वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 की धारा 1ए वन की परिभाषा को सीमित करती है और शब्दकोश के अर्थ के अनुसार समझे जाने वाले वन की श्रेणी को वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के दायरे से बाहर रखती है।
उन्होंने यह भी दलील दी कि केंद्र, राज्य और केंद्र-शासित प्रदेश उस जमीन का इस्तेमाल क्षतिपूरक वनीकरण के लिए करेंगे, जो असल में तो वन है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में वन के तौर पर दर्ज नहीं है (जैसे कि उजड़े हुए वन या निजी वन वगैरह), और परिमणामस्वरूप वन क्षेत्र का दायरा घट जाएगा।
पीठ ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है जिन्होंने अभी तक विशेषज्ञ समिति का गठन नहीं किया है, वे भूमि का एक संयुक्त रिकॉर्ड तैयार करने के लिए ऐसी समिति बनाएं। इसमें वन जैसे क्षेत्र, बिना श्रेणी वाली जमीनें और सामुदायिक वन भूमि शामिल हैं।
न्यायालय ने कहा कि वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 16 (1) के तहत जरूरी इस प्रक्रिया को पूरा किया जाना चाहिए।
पीठ ने तमिलनाडु में 59 एकड़ जमीन से जुड़ा एक मामला मद्रास उच्च न्यायालय को भेजा। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि यह जमीन खेती और बागवानी के लिए खरीदी गई थी, लेकिन 1922 की एक अधिसूचना के तहत इसे अब भी निजी वन के तौर पर रिकॉर्ड में रखा गया है।
न्यायालय ने कहा कि अलग-अलग भूखंडों से जुड़े ऐसे विवादों का निस्तारण उच्च न्यायालय करेंगे, जो जमीन के पुराने इस्तेमाल, भौगोलिक स्थिति और अन्य जरूरी बातों पर विचार करेंगे।
शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की चंद्रपुर में चिड़ियाघर बनाने की अलग-अलग याचिकाओं को केंद्रीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति के पास भी भेजा, जहां याचिकाकर्ता अपनी आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं।
भाषा सुभाष नरेश
नरेश

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