बीड, तीन मार्च (भाषा) भारत के विभिन्न हिस्सों में जहां होली को रंगों और पानी की बौछारों के साथ मनाया जाता है, वहीं महाराष्ट्र के बीड जिले के विदा गांव के लोग 90 साल पुरानी परंपरा को कायम रखे हुए हैं, जिसके तहत दामाद के लिए एक गधे की सवारी का आयोजन किया जाता है।
यह अनोखी परंपरा त्योहार से कुछ दिन पहले शुरू होती है, जिसे स्थानीय लोग दामाद की तलाश कहते हैं। इस वर्ष यह ‘‘सम्मान’ शिवाजी गलफड़े को मिला, जो मूल रूप से कैज तहसील के डोंगांव निवासी हैं और शादी के बाद विदा में बस गए थे।
यहां एक निवासी ने कहा, ‘‘यह परंपरा लगभग नौ दशक पुरानी है और इसकी शुरुआत अनंतराव देशमुख नाम के एक ग्रामीण ने की थी। अपने दामाद को गधे पर बिठाकर घुमाने के एक हल्के-फुल्के मज़ाक के रूप में शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे पूरे गांव के लिए बेसब्री से प्रतीक्षित एक वार्षिक अनुष्ठान में बदल गई।’’
ग्रामीणों के अनुसार, होली से एक सप्ताह पहले गांव के युवाओं के समूह विदा में रहने वाले या वहां आने वाले योग्य दामादों की पहचान करने के लिए खोज दल बनाते हैं।
चयन हो जाने के बाद, चुने हुए व्यक्ति को मित्रवत निगरानी में रखा जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह इस महत्वपूर्ण दिन से पहले भाग न जाए।
होली या धुलीवंदन की सुबह, ढोल की थाप और रंगों की बौछार के बीच दामाद को गधे पर बैठाया जाता है। पुराने जूतों की माला पहनाकर, उसे गांव की गलियों में घुमाया जाता है, जहां निवासी जयकारे लगाते हुए जश्न मनाते हैं।
सवारी की व्यंग्यात्मक प्रकृति के बावजूद, यह परंपरा दुर्भावना के बजाय सामुदायिक बंधन में निहित है।
जुलूस शुरू होने से पहले मंगलवार को प्रतिभागियों ने दिवंगत उपमुख्यमंत्री अजित पवार के चित्र पर माल्यार्पण किया और उन्हें श्रद्धांजलि दी।
एक ग्रामीण ने बताया कि गधे की सवारी के बाद एक औपचारिक सम्मान समारोह होता है। परंपरा के अनुसार, गांव वाले दामाद को नए कपड़े, एक साड़ी और एक सोने की अंगूठी भेंट करते हैं। हालांकि, सोने की कीमतों में हाल ही में हुई बढ़ोतरी के कारण, ग्राम समिति ने इस वर्ष पारंपरिक पोशाक को ही उपहार के रूप में देने का निर्णय लिया है।
भाषा यासिर मनीषा
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