नयी दिल्ली, तीन मार्च (भाषा) अदालती आदेशों के खिलाफ केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों द्वारा ‘‘बिना सोचे-समझे’’ अपील दाखिल करने की प्रवृत्ति को सरकार से जुड़े मुकदमों पर अंकुश लगाने के लिए एक प्रमुख चुनौती बताया गया है।
सरकारी मुकदमों के प्रभावी और कुशल प्रबंधन पर हाल ही में आयोजित एक सम्मेलन में, दो दर्जन से अधिक केंद्रीय सचिवों और शीर्ष विधि अधिकारियों ने सेवा और अन्य मामलों में अपीलों के लिए स्पष्ट मानदंड, मुकदमों के समन्वित निपटान के लिए प्रत्येक विभाग में एक विशिष्ट अधिकारी की नियुक्ति और अदालती फैसलों के समयबद्ध कार्यान्वयन के लिए तंत्र की सिफारिश की ताकि अवमानना संबंधी मुकदमों को कम किया जा सके।
केंद्रीय विधि मंत्रालय द्वारा शनिवार को यहां आयोजित सम्मेलन में, सेवा संबंधी मुकदमों, जवाबी हलफनामा दाखिल करने से पहले उचित परामर्श का अभाव, विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अपनाए गए भिन्न रुख, विभागों और पैनल वकीलों के बीच समन्वय की कमी तथा सुविचारित नीतिगत निर्णय के बजाय बिना किसी सोच-विचार के अपील दाखिल करने की प्रवृत्ति जैसी प्रमुख चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया।
अधिकारियों और मंत्रालय द्वारा साझा किए गए विवरणों के अनुसार भूमि मुआवजे से संबंधित मुकदमों में वृद्धि और बढ़ती ब्याज देनदारी, मध्यस्थता संबंधी आदेशों को नियमित रूप से चुनौती देने और अवसंरचना अनुबंधों में तकनीकी जटिलता आदि को लेकर चिंता व्यक्त की गई।
कानून मंत्रालय ने पिछले साल फरवरी में राज्यसभा को बताया था कि केंद्र सरकार अदालतों में लंबित लगभग सात लाख मामलों में पक्षकार है, जिनमें से अकेले वित्त मंत्रालय लगभग दो लाख मामलों में वादी है।
कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि लगभग सात लाख मामले लंबित हैं जिनमें भारत सरकार पक्षकार है। इनमें से लगभग 1.9 लाख मामलों में वित्त मंत्रालय पक्षकार है।
भाषा अविनाश माधव
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