जम्मू-कश्मीर: ज्येष्ठ अष्टमी पर खीर भवानी मंदिर में उमड़े श्रद्धालु

जम्मू-कश्मीर: ज्येष्ठ अष्टमी पर खीर भवानी मंदिर में उमड़े श्रद्धालु

जम्मू-कश्मीर: ज्येष्ठ अष्टमी पर खीर भवानी मंदिर में उमड़े श्रद्धालु
Modified Date: June 22, 2026 / 07:28 pm IST
Published Date: June 22, 2026 7:28 pm IST

(अनिल भट्ट)

(फोटो के साथ)

तुलमुल्ला, 22 जून (भाषा) कश्मीरी पंडित समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सवों में से एक ‘ज्येष्ठ अष्टमी’ के अवसर पर सोमवार को हजारों श्रद्धालु यहां खीर भवानी मंदिर में एकत्र हुए तथा वैदिक मंत्रोच्चार और शंखनाद के बीच यह पर्व मनाया। इस अवसर पर अनेक श्रद्धालुओं ने अपनी मातृभूमि में सम्मानजनक और सुरक्षित वापसी की मांग भी दोहराई।

इस वार्षिक उत्सव में इस बार हाल के वर्षों की तुलना में सबसे अधिक श्रद्धालुओं की मौजूदगी दर्ज की गई। देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालुओं ने मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में स्थित मंदिर परिसर में माता रागन्या भगवती के दर्शन किए। माता रागन्या भगवती, जिन्हें ‘माता क्षीर भवानी’ भी कहा जाता है, देवी पार्वती का एक अत्यंत पवित्र और पूजनीय स्वरूप हैं।

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया।

यह उत्सव देवी रागन्या भगवती के प्रकटोत्सव के रूप में मनाया जाता है। कश्मीर में देवी को समर्पित कई मंदिरों में यह पर्व मनाया जाता है, जिनमें तुलमुल्ला में खीर भवानी, देवसर में त्रिपुर सुंदरी, मंजगाम में राग्न्या भगवती, लोकतीपोरा और टिक्कर शामिल हैं।

विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए यह तीर्थयात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों से भावनात्मक जुड़ाव का अवसर भी थी।

मूल रूप से श्रीनगर की रहने वाली और वर्तमान में बेंगलुरु में रह रहीं 78 वर्षीय रूपा ने कहा कि उन्होंने समुदाय के विस्थापन की पीड़ा के अंत और अपने जीवन के अंतिम वर्ष मातृभूमि में बिताने की प्रार्थना की।

इसी तरह की भावनाएं दक्षिण कश्मीर के किलम गांव के मूल निवासी तथा वर्तमान में मुंबई में रह रहे प्रेमनाथ ने भी व्यक्त कीं।

प्रेमनाथ ने कहा, ‘‘हमने सामूहिक रूप से अपने समुदाय की सुरक्षित वातावरण में अपनी मातृभूमि में वापसी के लिए प्रार्थना की है।’’

मंदिर परिसर पूरे दिन श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा। श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की, दीप जलाए और देवी की स्तुति में भजन-कीर्तन किया।

भारी भीड़ के कारण मंदिर, यज्ञशाला और सामुदायिक रसोई के बाहर लंबी कतारें देखी गईं।

कई श्रद्धालुओं ने घाटी में कश्मीरी पंडितों के लिए सुरक्षित आवासीय क्षेत्र (होमलैंड) स्थापित करने की अपनी पुरानी मांग दोहराई।

कुलवागीशोरी मंदिर एसोसिएशन के अध्यक्ष रत्तन लाल जुत्शी ने सरकार से समुदाय के पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की।

उन्होंने कहा, ‘‘हम चाहते हैं कि सुरक्षित टाउनशिप की स्थापना और कश्मीरी पंडितों की सम्मानजनक वापसी सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं।’’

आतंकवादियों द्वारा मारे गए अशोक कुमार रैना के पुत्र विकास रैना ने आशा जताई कि केंद्र सरकार समुदाय की सुरक्षित मातृभूमि संबंधी मांग पर ध्यान देगी।

रैना ने कहा, ‘‘हम देश के नेतृत्व से ऐसे स्थायी समाधान की अपेक्षा रखते हैं जो विस्थापित कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा, सम्मान और स्थायी पुनर्वास सुनिश्चित करे।’’

मंदिर परिसर में उस समय भावुक दृश्य देखने को मिले जब स्थानीय मुस्लिम निवासियों ने आए हुए कश्मीरी पंडितों का गर्मजोशी से स्वागत किया। इस दौरान दोनों समुदायों के बीच साझा विरासत और सदियों पुराने भाईचारे की यादें ताजा हो गईं।

वार्षिक यात्रा के लिए घाटी पहुंचे कई विस्थापित पंडितों की अपने पुराने पड़ोसियों और मित्रों से मुलाकात हुई, जिससे यह धार्मिक आयोजन पुनर्मिलन और स्मृतियों का अवसर भी बन गया।

बडगाम निवासी शब्बीर अहमद डार ने बताया कि वह अपने बचपन के मित्र दीपक से मिलने आए थे, जो अब अमेरिका में रहते हैं।

डार ने कहा, ‘‘कई वर्षों बाद उनकी यह पहली यात्रा है और हमारी मुलाकात 36 साल बाद हुई है।’’

डार ने बताया कि यह पुनर्मिलन बेहद भावुक था क्योंकि दोनों ने कश्मीर में अपने बचपन और पंडितों के पलायन से पहले के जीवन को याद किया।

मंदिर परिसर में ऐसे कई पुनर्मिलन देखने को मिले, जहां दोनों समुदायों के लोगों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया, पुरानी यादें साझा कीं और कश्मीर में शांति तथा सौहार्द की वापसी की उम्मीद जताई।

मुसलमानों और कश्मीरी पंडितों के गले मिलने के दृश्य श्रद्धालुओं और आगंतुकों का ध्यान आकर्षित कर रहे थे, जो कश्मीर की पारंपरिक सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की संस्कृति को दर्शाते हैं।

दिनभर कई राजनेताओं ने भी मंदिर पहुंचकर श्रद्धालुओं से मुलाकात की। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी मंदिर जाकर श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं दीं।

भाषा रवि कांत रवि कांत संतोष

संतोष


लेखक के बारे में