नयी दिल्ली, 26 जनवरी (भाषा) नयी दिल्ली में 77वें गणतंत्र दिवस परेड के दौरान कर्तव्य पथ पर जम्मू-कश्मीर की कला और संस्कृति उस समय जीवंत हो उठी जब केंद्र शासित प्रदेश की झांकी में पारंपरिक शिल्पकला और सांस्कृतिक विरासत की भव्य झलक प्रस्तुत की गई।
झांकी में पारंपरिक कलाओं की भव्यता को दर्शाते हुए धातु नक्काशी से सजा चमकदार समोवार, प्रतीकात्मक डिजाइन से समृद्ध बारीकी से बुने कानी शॉल, ज्यामितीय सामंजस्य के साथ करघों से निकलते हाथ से बुने कालीन और अखरोट की नक्काशीदार लकड़ी से बने शिल्प प्रदर्शित किए गए।
रंग-बिरंगे पेपरमेशी शिल्प अपनी चमक बिखेरते नजर आए, जबकि पहाड़ी लघु चित्रकला, विशेषकर भावपूर्ण बसोहली शैली, सदियों की भक्ति से गढ़ी गई परिष्कृत सौंदर्य दृष्टि को दर्शा रही थी। ये शिल्प उन कारीगरों को समर्पित थे, जिनकी कुशलता और धैर्य ने जीवंत परंपराओं को संजो कर रखा है।
झांकी में केसर के फूलों को भी दर्शाया गया, जिनके बैंगनी फूल और गहरे लाल रेशे भूमि, श्रम और विरासत से जुड़ी एक कालातीत पहचान के प्रतीक थे।
इस दृश्य के साथ रबाब, संतूर और बांसुरी के सुरों का मधुर संगम गूंजता रहा, जिससे एक संगीतमय वातावरण बना। रंगीन परिधानों में सजे कलाकारों ने लोकनृत्यों के जरिए प्रस्तुति को जीवंत बना दिया।
झांकी में रौफ नृत्य की कोमलता, कुद नृत्य की ऊर्जा और पहाड़ी, भद्रवाही तथा गोजरी नृत्यों की जीवंत परंपराएं क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता, उल्लास और सामूहिक भावना को दर्शाती रहीं।
भाषा मनीषा अविनाश
अविनाश