सिख विरोधी दंगे: जनकपुरी हिंसा मामले में सज्जन कुमार ‘विश्वसनीय सबूतों के अभाव’ में बरी

सिख विरोधी दंगे: जनकपुरी हिंसा मामले में सज्जन कुमार ‘विश्वसनीय सबूतों के अभाव’ में बरी

सिख विरोधी दंगे: जनकपुरी हिंसा मामले में सज्जन कुमार ‘विश्वसनीय सबूतों के अभाव’ में बरी
Modified Date: January 22, 2026 / 09:11 pm IST
Published Date: January 22, 2026 9:11 pm IST

नयी दिल्ली, 22 जनवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान राष्ट्रीय राजधानी के जनकपुरी इलाके में हिंसा भड़काने से जुड़े मामले में बृहस्पतिवार को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

कुमार साल 2018 से जेल में बंद हैं, जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक-दो नवंबर 1984 को पालम कॉलोनी में पांच लोगों की हत्या से जुड़े मामले में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

विशेष न्यायाधीश दिग्विनय सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि अदालत पीड़ितों और उनके परिवारों की ओर से झेली गई पीड़ा को समझती है, लेकिन उसका निर्णय “भावनाओं से परे” होना चाहिए।

उन्होंने कहा, “इस मामले में आरोपी को दोषी ठहराने का फैसला पेश किए गए सबूतों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से, अभियोजन पक्ष ने जिन गवाहों से जिरह की, उनमें से ज्यादातर के बयान सुनी-सुनाई बातों पर आधारित हैं और/या वे ऐसे गवाह हैं, जिन्होंने तीन दशकों तक आरोपी का नाम नहीं लिया।”

न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि ऐसे गवाहों द्वारा आरोपी की पहचान किए जाने पर भरोसा करना “जोखिम भरा होगा और इससे अन्याय हो सकता है।”

उन्होंने कहा कि इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि कुमार अपराध स्थल पर मौजूद थे या उन्हें वहां किसी ने देखा था।

न्यायमूर्ति सिंह ने यह भी कहा कि इस घटना के सिलसिले में दंगाई भीड़ को उकसाने या साजिश रचने का भी कोई सबूत नहीं है।

अदालत ने 60 पन्नों के आदेश में कहा, “सार और मुख्य बात यह है कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ उचित संदेह से परे ऐसे सबूत पेश करने में विफल रहा है, जो किसी आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि के लिए आवश्यक होते हैं।”

उसने कहा, “संबंधित अपराध के दौरान आरोपी की मौजूदगी या उसके गैरकानूनी सभा का हिस्सा होने या किसी भी तरह से उकसाने, साजिश रचने या किसी अन्य तरह के समर्थन के जरिये अपराध में शामिल होने के संबंध में विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव के कारण, उसे आरोपों से बरी किया जाता है।”

इस बीच, शिकायतकर्ता हरविंदर सिंह के वकील मनिंदर सिंह ने निचली अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने के संकेत दिए। मनिंदर ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “हम पहले फैसले का गहन अध्ययन करेंगे और फिर दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर करेंगे।”

अदालत ने यह दलील खारिज कर दी कि कुमार को इसी तरह के अपराधों में पहले दोषी ठहराया जा चुका है। उसने कहा कि किसी व्यक्ति भले ही 100 अपराधों में दोषी ठहराया जा चुका हो, लेकिन 101वें अपराध में दोषी करार देने के लिए भी संदेह से परे सबूत जरूरी हैं।

अदालत ने कहा, “किसी व्यक्ति को केवल इसलिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वह अतीत में भी इसी तरह के अपराधों में शामिल रहा था। पिछला आपराधिक इतिहास या अन्य अपराधों का घटित होना अलग-अलग बातें हैं और किसी व्यक्ति को सजा सुनाते समय इनका कुछ महत्व हो सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति को दूसरे अपराध का दोषी ठहराते समय अदालत इन्हें ध्यान में नहीं रख सकती।”

उसने कहा, “केवल इसलिए कि आरोपी पूर्व सांसद है या अन्य स्थानों पर इसी तरह की घटनाओं में शामिल रहा है, यह अदालत इस मामले में उसे दोषी ठहराने के लिए आवश्यक सबूत के मानक को कम नहीं कर सकती। कानून सभी अपराधियों के लिए समान है-चाहे वे आम नागरिक हों या प्रभावशाली व्यक्ति।”

अदालत ने अभियोजन की इस दलील पर गौर किया कि जनकपुरी हिंसा मामले में साक्ष्यों का आकलन करते समय परिस्थितियों को भी उचित महत्व दिया जाना चाहिए, जिनमें पीड़ितों के साथ मारपीट कर उन्हें घायल करना, दो लोगों की मौत, उनके घरों एवं संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाना एवं उन्हें नष्ट किया जाना और पुलिस अधिकारियों की ओर से तत्काल मदद नहीं दिया जाना शामिल है।

उसने कहा, “इन बातों को स्वीकार किया जाता है, लेकिन गवाहों के पक्ष में यह छूट देने के बाद भी इस बात का कोई संतोषजनक औचित्य नहीं है कि उन्होंने तीन दशकों तक आरोपी का नाम नहीं बताया।”

अदालत ने कहा, “मामले के साक्ष्यों का सम्मान करते हुए, अदालत ने उन सभी कारकों पर विचार किया, फिर भी उसे यह बात आश्वस्त करने वाली नहीं लगती कि चोटों, जानमाल के नुकसान और संपत्ति की हानि ने गवाहों को इतने लंबे समय तक प्रभावित किया कि वे अपराध के अपराधी का नाम तक नहीं बता सके।”

उसने कहा कि अपराधी के हाथों अपने परिवार के किसी सदस्य को खोने वाला कोई भी गवाह ऐसे व्यक्ति को बख्शेगा नहीं और उसका नाम तुरंत बताना चाहेगा।

अदालत ने कहा, “इसलिए, अगले कुछ वर्षों में भले ही आरोपी के प्रभाव का डर कम हो जाए, लेकिन जिन परिवारों ने जानमाल का नुकसान झेला और जो प्रत्यक्षदर्शी भी थे, उनके सदस्यों का इतने लंबे समय तक आरोपी का नाम न लेने का कोई कारण नहीं हो सकता।”

अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि पीड़ित और आरोपी के बीच पहले से कोई शत्रुता नहीं थी, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि झूठे आरोप लगाने के लिए कोई मकसद नहीं था।

उसने कहा, “यह भी पूरी तरह से संभव है कि संबंधित अवधि में एक विशेष समुदाय के खिलाफ दंगे की विभिन्न घटनाओं में आरोपी की कथित भूमिका को देखते हुए इस मामले में भी आरोपी का नाम ले लिया गया हो।”

अदालत ने कहा, “पीड़ितों और उनके परिवारों की ओर से झेली गई तकलीफ को अच्छी तरह से समझा जा सकता है, लेकिन वह अनुभव इस अदालत के फैसले के आड़े नहीं आ सकता, जिसे भावनाओं से परे होना चाहिए।”

उसने कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से पेश साक्ष्य जब आरोपी की पहचान को निर्णायक रूप से साबित करने में विफल रहे, तो अन्य दलीलें महत्वहीन हो गईं और केवल सैद्धांतिक रह गईं।

सुनवाई के दौरान कुमार वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये अदालत के समक्ष पेश हुए। अदालत के सूत्रों ने बताया कि गणतंत्र दिवस से जुड़ी तैयारियों के मद्देनजर उन्हें शारीरिक रूप से पेश नहीं किया गया।

फैसला सुनाए जाने के कुछ देर बाद महिलाओं के एक समूह ने अदालत परिसर के बाहर कुमार के खिलाफ नारे लगाए। उन्होंने कहा कि कुमार को बरी किए जाने के आदेश ने न्याय मिलने की उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।

तिलक विहार की रहने वाली 70 वर्षीय पप्पी कौर ने कहा कि उन्होंने दंगों के दौरान अपने परिवार के कई सदस्यों को खो दिया था।

उन्होंने कहा, “मैंने सज्जन कुमार के खिलाफ हर सुनवाई में हिस्सा लिया। मुझे उम्मीद थी कि उसे कड़ी सजा मिलेगी। मैंने भीड़ को अपने रिश्तेदारों को बेरहमी से पीटते हुए देखा था। इस फैसले ने मुझे तोड़कर रख दिया है।”

एक विशेष जांच दल ने दंगों के दौरान जनकपुरी और विकासपुरी इलाकों में हुई हिंसा की शिकायतों के आधार पर फरवरी 2015 में कुमार के खिलाफ दो प्राथमिकी दर्ज की थीं।

पहली प्राथमिकी जनकपुरी में हुई हिंसा के मामले में दर्ज की गई थी, जहां एक नवंबर 1984 को सोहन सिंह और अवतार सिंह की हत्या कर दी गई थी।

दूसरी प्राथमिकी विकासपुरी में दो नवंबर 1984 को गुरचरण सिंह को कथित रूप से जला दिए जाने के मामले में दर्ज की गई थी।

फिलहाल जेल में बंद कुमार को पिछले साल फरवरी में एक अधीनस्थ अदालत ने सरस्वती विहार इलाके में एक नवंबर 1984 को जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

भाषा पारुल माधव

माधव


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