न्यायिक प्रक्रिया कानून के शासन को बनाए रखना के लिए : अदालत
न्यायिक प्रक्रिया कानून के शासन को बनाए रखना के लिए : अदालत
नयी दिल्ली, 27 फरवरी (भाषा) राजनीतिक रूप से संवेदनशील आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और 21 अन्य लोगों को आरोपमुक्त करते हुए, दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को कहा कि न्यायिक प्रक्रिया किसी सुविधाजनक परिणाम को सुनिश्चित करने या किसी खास विमर्श का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि कानून के शासन को बनाए रखने के लिए है।
अदालत ने कहा कि एक ऐसी प्रक्रिया जो अस्थायी और अप्रमाणित आरोप के आधार पर लंबे या अनिश्चितकालीन हिरासत का मार्ग प्रशस्त करती है, ‘‘दंडात्मक प्रक्रिया में परिवर्तित होने’’ का जोखिम पैदा करती है और ‘‘संवैधानिक महत्व की चिंता’’ उत्पन्न करती है, जिसमें धन शोधन निवारण अधिनियम को लागू करने से व्यक्तिगत स्वतंत्रता ‘‘खतरे में’’ पड़ जाती है।
विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने 598 पृष्ठों के आदेश में कहा, ‘‘यह अदालत एक गंभीर और बार-बार उत्पन्न होने वाली दुविधा का सामना कर रही है, जिसमें पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) के तहत शुरू किये गए मुकदमों के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है, जो इस धारणा पर आधारित है कि कथित रकम अपराध से अर्जित आय है।’’
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा उस वक्त और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब किसी आरोपी को धन शोधन के अपराध के लिए गिरफ्तार किया जाता है और उसके बाद उसे जमानत पाने के लिए निर्धारित कठोर दोहरी शर्तों को पूरा करना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप मुकदमे से पूर्व में भी लंबे समय तक आरोपी को हिरासत में रहना पड़ता है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह देखा गया है कि कई मामलों में, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अपराध की जांच पूरी होने से पहले ही, जमानत न मिलने के कानूनी परिणाम से बचने के लिए अभियोजन की शिकायत को दर्ज करने की दिशा में बढ़ जाता है।’’
उन्होंने कहा कि अक्सर यह देखा गया है कि मूल अपराध की जांच अधूरी रह जाती है और अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किया जाता है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह अदालत स्वयं एक ऐसे मामले की गवाह है जिसमें धन शोधन से संबंधित कार्यवाही आरोप पर बहस के अंतिम चरण में पहुंच गई है, जबकि मूल अपराध में, यह निर्धारित करने के लिए जांच अभी जारी है कि कोई अपराध हुआ है या नहीं।’’
उन्होंने गौर किया कि पीएमएलए मामले में आरोपियों का काफी समय से हिरासत में रहना महत्वपूर्ण मुद्दा है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह असामान्य स्थिति गंभीर कानूनी और संवैधानिक चिंताएं पैदा करती हैं, क्योंकि पीएमएलए के तहत कार्यवाही का जारी रहना, अपराध होने की स्थिति पर ही निर्भर करता है।’’
उन्होंने कहा कि इस स्थापित कानूनी स्थिति के बावजूद कि धन शोधन का मामला टिक नहीं सकता और इसके लिए कानून की नजर में टिकने योग्य अपराध की आवश्यकता होती है, प्रचलित व्यवहार एक चिंताजनक स्थिति को उजागर करता है।
न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे मामलों में, अपराध से संबंधित मूलभूत तथ्यों की न्यायिक जांच से पहले ही गिरफ्तारी और लंबी हिरासत की दंडात्मक शक्तियों का इस्तेमाल किया गया।
उन्होंने कहा, ‘‘इसके परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जिसमें किसी व्यक्ति को एक ऐसे आरोप के आधार पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित कर दिया जाता है जिसकी कानूनी वैधता अनिश्चित है और समानांतर जांच के परिणाम पर निर्भर करती है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘एक बार स्वतंत्रता पर अंकुश लग जाने के बाद, बाद में आरोपमुक्त होने से उसे सार्थक रूप से बहाल नहीं किया जा सकता है… और न ही अनुचित हिरासत के कारण हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है।’’
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इसलिए ऐसी शक्ति का प्रयोग इस स्थापित सिद्धांत के अनुरूप होना चाहिए कि गिरफ्तारी और लंबी हिरासत अपवाद हैं, नियम नहीं।’’
न्यायाधीश ने कहा कि आर्थिक अपराधों की प्रभावी जांच में संप्रभु हित और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाने के लिए एक नीति बनाने की आवश्यकता है।
विशेष न्यायाधीश सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि जांच एजेंसी की शक्ति तथा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना एक ‘‘संवैधानिक व्यवस्था’’ है।
उन्होंने कहा कि इस संतुलन को बनाए रखने में किसी भी प्रकार की विफलता से कानून के शासन और आपराधिक न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास, दोनों को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
भाषा सुभाष अविनाश
अविनाश

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