केरल उच्च न्यायालय ने जनजातीय समुदाय के व्यक्ति की हत्या के मामले में पहले आरोपी को बरी किया

केरल उच्च न्यायालय ने जनजातीय समुदाय के व्यक्ति की हत्या के मामले में पहले आरोपी को बरी किया

केरल उच्च न्यायालय ने जनजातीय समुदाय के व्यक्ति की हत्या के मामले में पहले आरोपी को बरी किया
Modified Date: May 25, 2026 / 02:25 pm IST
Published Date: May 25, 2026 2:25 pm IST

कोच्चि, 25 मई (भाषा) केरल उच्च न्यायालय ने 2018 में अट्टापडी में एक जनजातीय युवक की हत्या के मामले में पहले आरोपी को सोमवार को बरी कर दिया।

पलक्कड़ जिले के अट्टापडी स्थित चिंदक्की ओरु निवासी मधु (27) की फरवरी 2018 में कथित तौर पर एक दुकान से चावल और किराने का सामान चोरी करने के आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

मधु को भीड़ द्वारा पकड़े जाने और अपमानित किए जाने की तस्वीरें सामने आने के बाद पूरे केरल में व्यापक आक्रोश फैल गया था।

मामले से जुड़े एक वकील ने बताया कि उच्च न्यायालय ने अन्य आरोपियों के खिलाफ राज्य सरकार की ओर से दायर अपील को भी आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।

उन्होंने बताया कि अदालत ने 16वें आरोपी की सजा भी बढ़ाई है।

वकील के अनुसार, अदालत ने पहले आरोपी हुसैन की दोषसिद्धि और सजा को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि उसके खिलाफ पर्याप्त और प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि हुसैन ने अदालत के समक्ष यह साबित किया कि जिन दो गवाहों ने उसकी पहचान की, वे घटना के समय घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे।

अदालत के समक्ष पेश डिजिटल रिकॉर्ड से पता चला कि उस समय दोनों गवाह किसी अन्य स्थान पर थे।

पीठ ने चौथे और 11वें आरोपी को बरी करने के फैसले को भी बरकरार रखा और मन्नारकाड की अनुसूचित जाति-जनजाति विशेष अदालत के पूर्व फैसले की पुष्टि की।

विशेष अदालत ने अप्रैल 2023 में इस मामले के 16 आरोपियों में से 14 को दोषी ठहराया था। इनमें से 13 आरोपियों को गैर-इरादतन हत्या और अन्य अपराधों का दोषी मानते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी, जबकि 16वें आरोपी को तीन महीने की साधारण कैद और 500 रुपये जुर्माने की सजा दी गई थी। चौथे और 11वें आरोपी को बरी कर दिया गया था।

बाद में राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में अपील दायर करते हुए कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए अधीनस्थ अदालत द्वारा दी गई सजा अपर्याप्त है।

अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि मधु पर हमला एक आदिवासी व्यक्ति के खिलाफ किया गया “क्रूर और अमानवीय कृत्य” था और आरोपियों को कानून के तहत अधिकतम सजा मिलनी चाहिए।

राज्य सरकार ने अधीनस्थ अदालत के उस फैसले को भी चुनौती दी, जिसमें इस अपराध को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या माना गया था।

अभियोजन पक्ष का कहना था कि मुकदमे के दौरान पेश मौखिक, डिजिटल, वैज्ञानिक और चिकित्सकीय साक्ष्य संदेह से परे अपराध को साबित करते हैं और कड़ी सजा को उचित ठहराते हैं।

फैसला सुनाने से पहले उच्च न्यायालय ने सभी आरोपियों को 25 मई को अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया था। खंडपीठ ने जेल अधिकारियों को सजा काट रहे दोषियों को अदालत में पेश करने तथा जमानत पर रिहा आरोपियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया था।

भाषा खारी वैभव

वैभव


लेखक के बारे में