(माणिक गुप्ता)
नयी दिल्ली, छह अप्रैल (भाषा) लेखिका किरण देसाई का कहना है कि हार के भी अपने फायदे हैं क्योंकि वह इस बात को बखूबी जानती हैं कि जीत किसी व्यक्ति को कितना प्रभावित कर सकती है तथा अब वह अपनी मां और प्रख्यात लेखिका अनीता देसाई का ख्याल रखना चाहती हैं।
किरण देसाई महज 35 वर्ष की थीं जब उन्होंने अपने 2006 के उपन्यास ‘‘द इनहेरिटेंस ऑफ लॉस’’ के लिए बुकर पुरस्कार जीता था। उस समय ऐसा करने वाली वह सबसे कम उम्र की महिला लेखिका थीं। पिछले साल नवंबर में जब उनके उपन्यास ‘‘द लोनलीनेस ऑफ सोनिया एंड सनी’’ को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए अंतिम सूची में शामिल किया गया था, तब वह एक बार फिर इस पुरस्कार के काफी करीब पहुंच गई थीं।
हालांकि, उन्हें दूसरी बार बुकर पुरस्कार नहीं मिल सका, लेकिन उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं है।
देसाई ने अपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘समय के साथ मैंने यह सीखा है कि जीतना बेशक सम्मान की बात है, लेकिन हार के भी अपने फायदे हैं। मुझे याद है मैंने अपनी मां से कहा था, ‘मैं जीतना नहीं चाहती’ क्योंकि मैं जानती थी कि सबकी निगाहें मुझ पर टिकी होने से कितना तनाव होगा। मेरी मां अब 88-89 साल की हैं, मैं उनका ख्याल रखना चाहती हूं। वही मेरी प्राथमिकता हैं।’’
किरण ने कहा, ‘‘और यह भी, जैसा कि मैं अपने संपादक को बता रही थी कि जब आप पर किसी की नजर नहीं होती तो आप खुलकर कुछ भी लिख सकती हैं, और लेखन का असली मतलब यही है। आप अकेले होते हैं, आप आत्म-सचेत नहीं होते, और आप सचमुच काम करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। तो हां, अकेलेपन के भी कुछ फायदे होते हैं।’’
उन्हें याद है कि पहला बुकर पुरस्कार जीतना कितना अभिभूत करने वाला था।
न्यूयॉर्क में रहने वाली 54 वर्षीय लेखिका उसे याद कर मुस्कुराती हैं और कहती हैं कि उसके बाद वह अपनी किताब की दुनिया से बाहर निकलकर शायद ही कभी सोच पाईं।
उनकी मां अनीता देसाई, जिन्हें ‘‘क्लियर लाइट ऑफ डे’’ (1980), ‘‘इन कस्टडी’’ (1984) और ‘‘फास्टिंग, फीस्टिंग’’ (1999) के लिए तीन बार बुकर पुरस्कार के लिए ‘शॉर्टलिस्ट’ किया गया है, इस बात को बखूबी जानती हैं कि पहचान कितना मायने रखती है।
इस बार करीबी मुकाबले में किरण देसाई के बुकर पुरस्कार से चूक जाने के बाद, उनकी मां के ज्ञानवर्धक शब्द अपनी बेटी के लिए बिल्कुल सही साबित हुए।
किरण देसाई ने यह पुरस्कार हंगरी-ब्रिटिश लेखक डेविड स्ज़ेले के हाथों गंवा दिया, जिन्हें उनकी पुस्तक ‘‘फ्लेश’’ के लिए 2025 का बुकर पुरस्कार मिला।
उन्होंने बताया, ‘‘उन्होंने (अनीता देसाई) मुझसे कहा, अब तुम अपने जीवन और अपने काम के साथ प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हो।”
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे ठीक यही महसूस हुआ – इसने मुझे स्वतंत्रता दी।’’
उनकी नवीनतम रचना, जो लगभग 700 पृष्ठों की है, भारत, मैक्सिको और अमेरिका की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसमें साहित्य की छात्रा सोनिया, दिल टूटने और सृजनात्मक आकांक्षा से जूझ रही है, जबकि युवा पत्रकार सनी सांस्कृतिक अपेक्षाओं और अकेलेपन से जूझ रहा है।
किरण देसाई, जो अपनी मां की तरह रोजाना लिखती हैं और अपनी दिनचर्या में किसी भी तरह की रुकावट को ‘‘परेशान करने वाली’’ मानती हैं, ने कहा कि ‘‘द लोनलीनेस ऑफ सोनिया एंड सनी’’ को आखिरकार पूरा करने के बाद उन्हें काफी राहत महसूस हुई, जिसे पूरा करने में लगभग दो दशक लग गए।
उन्होंने कहा, “मुझे इस किताब पर काम करके बहुत खुशी हुई। और मैं अब भी अक्सर सोचती हूं कि मैं इसे अलग तरीके से कर सकती थी, यह और बेहतर हो सकता था। लेकिन लेखन में ऐसा होता है।’’
उन्होंने कहा कि इन किरदारों के साथ इतने लंबे समय तक रहने के बाद, ये सवाल मन में बने रहते हैं : क्या वे कभी सचमुच में ओझल हो जाएंगे, या वे चुपचाप उनके साथ बने रहते हैं जब वह नयी कहानियों की ओर बढ़ती हैं?
देसाई के अनुसार, पात्र कभी पूरी तरह से ओझल नहीं होते। उनका पहला उपन्यास, ‘‘हुल्लाबालू इन द गुआवा ऑर्चर्ड’’, 1998 में प्रकाशित हुआ था।
दो दशक से अधिक समय से न्यूयॉर्क में रह रही देसाई 14 साल की उम्र में अपनी मां के साथ भारत छोड़कर चली गई थीं।
उन्होंने कहा, ‘‘इस किताब को लिखने की प्रक्रिया के दौरान मेरे पिता जीवित थे। मैं नोट्स बनाती थी। मैं घर (भारत) जाती थी। और मुझे पता था कि मैं भारत के बारे में आगे नहीं लिख सकूंगी। इसलिए मैं इस तरह से एक आखिरी किताब लिखना चाहती थी।’’
भाषा सुभाष नरेश
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