सीईसी की नियुक्ति संबंधी कानून पर संसद में चर्चा नहीं हुई: याचिकाकर्ताओं का न्यायालय में दावा
सीईसी की नियुक्ति संबंधी कानून पर संसद में चर्चा नहीं हुई: याचिकाकर्ताओं का न्यायालय में दावा
नयी दिल्ली, सात मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय के समक्ष बृहस्पतिवार को दावा किया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति को विनियमित करने वाले 2023 के कानून को पारित करते समय संसद में वस्तुतः कोई बहस नहीं हुई और विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
सीईसी और ईसी की नियुक्ति को विनियमित करने वाले कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष कई वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश की। कानून में इन संवैधानिक पदाधिकारियों की नियुक्ति करने वाली समिति में प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 नियुक्तियों की प्रक्रिया को पूरी तरह से कार्यपालिका के प्रभुत्व के अधीन करके निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘कई सांसदों को निलंबित किए जाने के कारण वस्तुतः कोई बहस नहीं हुई। (असदुद्दीन) ओवैसी ने दृढ़तापूर्वक तर्क दिया था कि यह अधिनियम अनूप बरनवाल (निर्णय) के विरुद्ध है और नियुक्ति पूरी तरह से सरकार की व्यक्तिपरक संतुष्टि पर आधारित है।’’
भूषण ने कहा, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने इसका बचाव करने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने बस एक प्रस्ताव पेश किया और ध्वनिमत से उसे पारित कर दिया।’’
मामले की सुनवाई की शुरुआत में पीठ ने अपनी टिप्पणी दोहराई कि क्या वह संसद को मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रियाओं को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का निर्देश दे सकती है।
न्यायमूर्ति दत्ता ने एक याचिका का उल्लेख किया जिसमें शीर्ष न्यायालय से संसद को मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का निर्देश देने की गुहार लगाई गई है।
उन्होंने कहा, ‘‘ अनुरोधों का अवलोकन करते हैं… इसने संसद से कानून बनाने का अनुरोध किया है। क्या न्यायालय संसद से कानून बनाने को कह सकता है? क्या यह मामला विचारणीय है?’’
दूसरे दिन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई जारी रखते हुए, पीठ ने कई अधिवक्ताओं की दलीलें सुनी।
वर्ष 2023 के कानून में केंद्रीय चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को शामिल करने का प्रावधान है।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने दलील दी कि यह कानून अनूप बरनवाल मामले में संविधान पीठ के फैसले द्वारा निर्धारित संवैधानिक सिद्धांतों से परे है, जिसमें यह निर्देश दिया गया था कि संसद द्वारा कानून पारित होने तक चुनाव आयोग में नियुक्तियां प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधान न्यायाधीश की एक समिति द्वारा की जानी चाहिए।
हंसारिया ने कहा कि बरनवाल फैसला केवल समिति की अंतरिम संरचना निर्धारित करने तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसमें संवैधानिक आवश्यकता को भी स्पष्ट किया गया था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त रहे।
अधिवक्ता ने कहा, ‘‘एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग संवैधानिक आवश्यकता है।’’ उन्होंने साथ ही जोड़ा कि संविधान निर्माताओं ने चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए एक स्वायत्त संवैधानिक प्राधिकरण की परिकल्पना की थी।
न्यायमूर्ति दत्ता ने हालांकि बार-बार यह सवाल उठाया कि क्या संविधान पीठ के फैसले ने संसद को एक विशेष तरीके से कानून बनाने के लिए बाध्य किया है।
उन्होंने सवाल किया, ‘‘क्या फैसले में ऐसा कोई उल्लेख है कि संसद द्वारा कानून बनाते समय इस फैसले को ध्यान में रखा जाना चाहिए?’’
हंसारिया ने इस पर दलील दी कि संसद द्वारा पारित किसी भी कानून को उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
उन्होंने तर्क दिया,‘‘न्यायपालिका की तरह, निर्वाचन आयोग भी लोकतंत्र का प्रहरी है।’’
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) के फैसले में उच्चतम न्यायालय के तर्क के साथ समानताएं बताते हुए, हंसारिया ने दलील दी कि महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक कार्यों का निर्वाह करने वाली संवैधानिक संस्थाओं को कार्यपालिका के प्रभुत्व के अधीन नहीं किया जा सकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने पीठ को सूचित किया कि विधेयक पारित होने के समय लोकसभा में 95 विपक्षी सदस्यों और राज्यसभा में 12 सदस्यों को निलंबित कर दिया गया था।
न्यायमूर्ति दत्ता ने हालांकि टिप्पणी की कि अनूप बरनवाल के फैसले ने संसद द्वारा कानून पारित किए जाने तक केवल संवैधानिक शून्यता को भरा था।
पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘यह फैसला केवल कानून बनने तक की रिक्ति को भरने के लिए था। इसमें यह उल्लेख नहीं है कि कानून को किसी विशेष तरीके से बनाया जाना चाहिए।’’
हंसारिया ने स्पष्ट किया कि वह मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू की नियुक्तियों को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि उनकी नियुक्तियों से जुड़े हालात का इस्तेमाल कार्यपालिका में शक्ति के केंद्रीकरण के खतरों को प्रदर्शित करने के लिए कर रहे हैं।
उन्होंने अदालत को बताया कि नेता प्रतिपक्ष को 13 मार्च, 2024 को लगभग 200 नामों की सूची मिली थी, जिसके बाद 14 मार्च को छह नामों की एक छोटी सूची दी गई, उसी दिन चयन समिति की बैठक हुई और कुमार और संधू के नामों की सिफारिश की गई। दोनों ने अगले दिन शपथ ली।
हंसारिया ने सवाल किया, ‘‘नेता प्रतिपक्ष से एक ही दिन में इतने सारे नामों पर विचार करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?’’ इस मामले पर सुनवाई अगले बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।
इस कानून को कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एडीआर सहित कई याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है।
भाषा धीरज अविनाश
अविनाश

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